रहस्य: क्यों हमेशा के लिए बंद कर दिया गया कुतुब मीनार का दरवाजा

कुतुब मीनार देखने में जितना सुंदर है और अपनी कलाकारी से जितना प्रभावित करता है, उससे जुड़े राज उतने ही खौफनाक हैं.

इस इमारत को दिल्ली के पहले सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने साल 1199 में बनवाया था, जो 1220 में जाकर पूरी तरह तैयार हुआ.

दुनिया की सबसे ऊंची ईंटों से बनी यह इमारत आज UNESCO World Heritage Site में शामिल है.

4 दिसंबर 1981 से पहले तक यह जगह आम लोगों के लिए पूरी तरह खुली रहती थी. लेकिन 4 दिसंबर वह दिन खा जिसने कुतुब मीनार के इतिहास में काला सच लिख दिया.

उस दिन भी लोग इसके अंदर गए थे ताकि ऊपर से दिल्ली का नजारा देख सकें, लेकिन उस दिन नजारा देखने की जगह एक दर्दनाक हादसा हो गया.

4 दिसंबर 1981 की दोपहर, कुतुब मीनार के भीतर हमेशा की तरह भीड़ थी. कई स्कूलों के बच्चे भी पिकनिक पर आए थे.

अचानक मीनार के अंदर की लाइट चली गई और चारों तरफ अंधेरा छा गया. ऊपर-नीचे चल रही भीड़ में अफरा-तफरी फैल गई. अंधेरे में बच्चों की चीखें गूंजने लगीं और भगदड़ मच गई.

अंधेरा होने के बाद लोग रास्ता ढूंढ नहीं पा रहे थे. तंग और गोल घूमती सीढ़ियों में बच्चे और लोग गिरने लगे.

मीनार का दरवाजा अंदर की ओर खुलता था. घबराए हुए लोग उसी जगह इकट्ठा हो गए, जिससे दरवाजा बाहर से खोलना भी मुश्किल हो गया और सुरक्षा कर्मचारी अंदर पहुंच नहीं पाए.

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, इस भगदड़ में कई लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हो गए.

इसी हादसे के बाद सरकार ने तत्काल कार्रवाई की और 4 दिसंबर 1981 के बाद से मीनार के अंदर जाने का दरवाजा हमेशा के लिए बंद कर दिया गया.