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कान छेदन सिर्फ एक सांस्कृतिक रस्म नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरी धार्मिक, आध्यात्मिक और स्वास्थ्य से जुड़ी मान्यताएं भी हैं.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर कान छेदन क्यों किया जाता है? अगर नहीं तो चलिए हम आपको बताते हैं.
हिंदू मान्यता के अनुसार कान ज्ञान प्राप्ति का मुख्य माध्यम हैं. वेदों में ध्वनि को ज्ञान का आधार माना गया है.
इसलिए कान छेदन को व्यक्ति के 'अंतर कान' खोलने और दिव्य ध्वनियों को ग्रहण करने की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है.
आयुर्वेद के अनुसार कान की लोब में कई महत्वपूर्ण एक्यूप्रेशर बिंदु होते हैं. इन्हें छेदने से मस्तिष्क के विकास में मदद मिलती है.
साथ ही यह दृष्टि, सुनने की क्षमता और मानसिक संतुलन को बेहतर बनाने में सहायक माना जाता है.
कुछ मान्यताओं के अनुसार यह चिंता और घबराहट जैसी समस्याओं को कम करने में भी मदद करता है.
भारत के अलग-अलग हिस्सों में कर्णवेध संस्कार आज भी प्रचलित है. उत्तर भारत में यह संस्कार पंडित द्वारा कराया जाता है.
कई जगह इसे मुंडन संस्कार के साथ भी जोड़ा जाता है. यह परंपरा आज भी लोगों को अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़े रखती है.