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BC सखी योजना से आत्मनिर्भर बन रहीं महिलाएं, बदल रही यूपी के गांवों की तस्वीर

उत्तर प्रदेश के चंदौली में बीसी सखी योजना से कई महिलाओं की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया है. ज्योति कहती हैं कि बीसी सखी योजना से जुड़ने के बाद से वह इतनी सक्षम हो चुकी हैं कि अपने बच्चों की फीस जमा कर सकती हैं और अपने परिवार को भई सुचारू रूप से चला सकती हैं.

BC Sakhi scheme
उदय गुप्ता
  • चंदौली,
  • 12 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:47 AM IST

उत्तर प्रदेश में बैंकिंग सेवाओं के साथ-साथ कई अन्य सुविधाओं को घर-घर जाकर लोगों को सुविधा देने की गरज से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत ग्राम पंचायत स्तर पर बैंक कॉरेस्पोंडेंट सखी यानी बीसी सखी की नियुक्ति की गई है. जिसके तहत बैंक रेस्पोंडेंट सखी अपने गांव के पंचायत भवन में स्थित अपने दफ्तर में बैठकर या फिर डोर टू डोर जाकर बैंकिंग के साथ-साथ अन्य कई सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं. 

सरकार की इस योजना से न सिर्फ ग्रामीण अंचल के लोगों को अपने दरवाजे पर ही बैंकिंग समेत तमाम तरह की सुविधाओं का लाभ मिल रहा है. बल्कि इस योजना से जुड़ने के बाद बैंक कॉरेस्पोंडेंट सखी यानी बीसी सखी के रूप में काम करने वाली महिलाओं के जीवन स्तर में भी काफी बदलाव आया है. 

इस योजना से जुड़ी महिलाएं न सिर्फ आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन रही हैं.बल्कि उनके अंदर एक अलग तरह का कॉन्फिडेंस भी डेवलप हो रहा है. आज हम आपको पूर्वी उत्तर प्रदेश के चंदौली की दो बैंक कॉरेस्पोंडेंस सखियों और उनकी सफलता की कहानी के बारे में बताएंगे. साथ ही हम यह भी बताएंगे कि इस योजना के लाभार्थियों का क्या कहना है.

ज्योति विश्वकर्मा की कहानी-
सफलता की पहली कहानी है बैंक कॉरेस्पोंडेंस सखी के रूप में काम करने वाली पूर्वी उत्तर प्रदेश के चंदौली के नवही गांव की रहने वाली ज्योति विश्वकर्मा की. ज्योति विश्वकर्मा ने एम.ए. तक की पढ़ाई की है. ज्योति विश्वकर्मा इस योजना से आज से तकरीबन 4 साल पहले 2022 में जुड़ी थी. 
ज्योति विश्वकर्मा पहले समूह से जुड़ी. जिससे उनको 75000 रुपये का लोन मिला. उसमें से कुछ पैसे का तो इन्होंने मशीन खरीद और बाकी पैसे से बैंकिंग का काम शुरू किया. अपने इस सफर के बारे में ज्योति विश्वकर्मा बताती हैं कि इस योजना से जुड़ने से पहले वह घर में चूल्हा चौका करती थी और परिवार की देखभाल करती थी. 

ज्योति विश्वकर्मा पढ़ी लिखी थी. लेकिन ग्रामीण परिवेश में रहने की वजह से घर से बाहर निकल कर काम करने में इनको झिझक होती थी. लेकिन अब ज्योति विश्वकर्मा बड़े गर्व के साथ कहती हैं कि जब से मैं बैंक कॉरेस्पोंडेंट सखी बनी हूं, उसके बाद से लोग मुझे दीदी के नाम से बुलाते हैं. अब लोग मेरे ससुर का नाम नहीं लेते, बल्कि मेरे नाम से मेरे परिवार को जानने लगे हैं. 

ज्योति विश्वकर्मा आगे बताती है कि आज की तारीख में मैं इतनी सक्षम हो चुकी हूं कि अपने बच्चों की फीस जमा कर सकती हूं और अपने परिवार को भी सुचारू रूप से चल सकती हूं. अपने कामकाज के बारे में ज्योति विश्वकर्मा बताती है कि पंचायत भवन में मुझे एक कुर्सी और टेबल मिला है, जहां बैठकर मैं अपना काम करती हूं. 

जब कोई सत्य अक्षम महिला या व्यक्ति उनका फोन करके बताता है कि उन्हें बैंकिंग या अन्य कार्यों की जरूरत है तो मैं उनके घर जाकर भी सेवाएं देती हूं. अगर उन्हें पैसे की जरूरत होती है तो उनको पैसा भी देता हूं और अगर उनके अकाउंट में पैसा जमा भी करना होता है तो वह काम भी मैं आसानी से कर देती हूं.
 
ज्योति विश्वकर्मा अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि जब मैं इस योजना से जुड़ी तो मेरे परिवार के लोगों ने ही कहा कि इस काम के लिए बाहर निकलना होगा और इधर-उधर जाना होगा. इन सब बातों से मैं भी थोड़ी नर्वस हो गई कि यह काम मुझे नहीं हो पाएगा.
 
शुरुआत में मुझे लगा कि गांव का माहौल है गांव के लोग क्या कहेंगे. शुरुआत में तो लोग कहते थे कि उनकी बहू घर से बाहर निकलती है और कामकाज करती है. लेकिन आज वही लोग मेरे बारे में पैसा कैसे जमा होगा, कैसे निकाला जाएगा, इस तरह की जानकारी लेती हैं. साथ ही मुझसे इस बात की भी जानकारी लेती है कि बैंक का खाता कैसे खुलेगा, समूह का खाता कैसे खुलेगा. आज की तारीख में गांव की तमाम महिलाएं मुझे इस तरह की जानकारी लेती हैं. 

ज्योति विश्वकर्मा बताती है कि अब परिवार के लोग भी उन्हें काफी सपोर्ट करते हैं और उनको भी कोई जानकारी लेनी होती है तो हमसे ही जानकारी लेते हैं. हमारे पति भी कहते हैं कि अब हमें कोई दिक्कत नहीं है आप बाहर जाकर आराम से कम करिए. ज्योति विश्वकर्मा बताती हैं कि हमारे साथ ससुर बुजुर्ग हो चुके हैं घर पर रहते हैं. दोनों बच्चे जब स्कूल चले जाते हैं. उसके बाद वह घर का कामकाज निपटा कर बैंकिंग के काम में लग जाती है.

4 साल पहले योजना से जुड़ी थी नासरीन-
ज्योति विश्वकर्मा की तरह बैंक कारस्पोंडेंट सखी के रूप में काम करने वाली नासरीन बानो भी सफलता की नई कहानी गढ़ रही हैं. नासरीन बानो चंदौली जिले के सदर ब्लाक के नेगुरा गांव की रहने वाली हैं. उनके पति वेल्डिंग का काम करते हैं. घर में सास ससुर देवर देवरानी और उनके बच्चे हैं. 

नसरीन बानो 4 साल पहले इस योजना से जुड़ी थी और बैंक कॉरेस्पोंडेंस सखी के रूप में काम करना शुरू किया था. अपने घर का कामकाज निपटने के बाद नसरीन बानो भी अपने गांव में बने पंचायत भवन में पहुंचती हैं और वहां पर मौजूद गांव के लोगों को बैंकिंग की सुविधा उपलब्ध कराती हैं. 

इसके साथ ही साथ नसरीन बानो जरूरत के हिसाब से लोगों के घर-घर भी पहुंचती हैं और वहां जाकर भी उन्हें बैंकिंग के साथ-साथ अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराती हैं. अपने इस सफर के बारे में नसरीन बानो बताती हैं कि हम पिछले 4 साल से इस योजना से जुड़े हुए हैं. हम लोग अपना घर का काम करते हैं और घर परिवार की जिम्मेदारी उठाते हुए सारा काम करने के बाद यहां पंचायत भवन पर आते हैं और यहां पर पैसा निकालने से लेकर जमा करने तक की सुविधा लोगों को प्रदान करते हैं. लोग यहां पर आते हैं और हम उन्हें लाभान्वित कराते हैं. हम लोग लोन आदि की सुविधा भी लोगों को प्रदान करते हैं. 

नसरीन बानो बताती है कि हम पहले कुछ भी नहीं कर रहे थे, घर में ही रहते थे, लेकिन सबसे पहले हम समूह से जुड़े और उसके बाद बैंक कॉरेस्पोंडेंट सखी बने. इस योजना से जुड़ने के बाद हम घर से बाहर निकलना शुरू किए. इससे हमें लाभ होने लगा तो हम किस काम को मन लगाकर करने लगे. 
नसरीन बानो बताती है कि इस योजना से जुड़ने से पहले हमको 1 रुपए का भी काम नहीं करते थे और नहीं हमको कोई आर्थिक लाभ मिलता था. लेकिन जब हम इस योजना से जुड़े और काम करने लगे तो हमारे पास जो भी इनकम आता है. उसे हम खुद खर्च करते हैं, अपने बच्चों में खर्च करते हैं, उनके लिए किताबें और दवा आदि की जरूरत होती है उसे भी पूरा करते हैं. 

नसरीन अपने जीवन में आए बदलाव को लेकर कहते हैं कि अब हमें अपने हस्बैंड से किसी भी चीज के लिए कहना नहीं पड़ता. हम अपना खुद ही सब कुछ कर लेते हैं. सरकार की यह बहुत अच्छी योजना है.

योजना की हो रही तारीफ-
उधर सरकार की इस योजना के माध्यम से अपने घर के दरवाजे पर ही बैंकिंग की सुविधा पाने वाले लाभार्थी ग्रामीण भी काफी खुश दिखाई दिए. नेगुरा गांव की रहने वाली जमीला बताती है कि यह बहुत ही अच्छी योजना है और इसे पैसा घर पर ही निकल जाता है. हमें कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ती. अंगूठा लगाकर हम लोग घर पर ही पैसा निकाल लेते हैं. जरूरत पड़ने पर हम लोग बीसी सखी दीदी को घर पर बुला लेते हैं. इसकी वजह से हमें काफी सुविधा मिलती है. हमें कहीं जाना नहीं पड़ता, घर बैठे ही काम हो जाता है.

वहीं, चंदौली जिले की ही नवही गांव की रहने वाली महिला लक्ष्मीना देवी बताती हैं कि हमारे लिए काफी अच्छी सुविधा है. हमारे गांव की बीसी सखी हमारे घर पर आती हैं और अगर हमें पैसा जमा करना होता है तो हम जमा कर देते हैं, निकालना होता है तो निकाल लेते हैं. सरकार की योजना बहुत अच्छी है. हम लोगों को यह लाभ है कि हम लोगों को बाहर नहीं जाना पड़ता घर में ही सुविधा मिल जाती है.

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