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देश में सबसे ज्यादा GI टैग वाला सूबा है उत्तर प्रदेश, सरकार कैसे पारंपरिक उत्पादों को दिला रही पहचान? समझिए

देश में सबसे ज्यादा GI टैग वाला सूबा उत्तर प्रदेश है. मई 2025 तक सूबे के पास 77 जीआई टैग थे. उत्तर प्रदेश सरकार जिओग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग के जरिए राज्य के पारंपरिक उत्पादों को नई पहचान और बाजार दिला रही है. चलिए समझते हैं कैसे?

Uttar Pradesh GI Tag
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 07 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 12:42 PM IST

जिओग्राफिकल इंडिकेशन यानी GI टैग एक तरह की कानूनी पहचान है, जो किसी खास इलाके से जुड़े उत्पाद को दी जाती है. यह टैग बताता है कि कोई उत्पाद असल में उसी जगह पर बना है, जहां से उसका नाम जुड़ा है, और उसकी खासियत भी उसी जगह की वजह से है. जैसे वाराणसी की सिल्क साड़ियां असली तभी कहलाएंगी, जब वो वाराणसी में ही बनी हों. उत्तर प्रदेश GI टैग वाले उत्पादों की संख्या के मामले में देश का सबसे आगे राज्य है, और अब राज्य सरकार इसे और मजबूत बनाने में जुटी है.

यूपी सबसे ज्यादा GI टैग वाला सूबा-
उत्तर प्रदेश देश में सबसे ज्यादा GI टैग वाले उत्पादों वाला राज्य है. मई 2025 तक राज्य के पास 77 GI टैग प्राप्त उत्पाद थे. इनमें कुछ सबसे जाने-पहचाने नाम शामिल हैं:

  • वाराणसी की बनारसी सिल्क साड़ियां और ब्रोकेड
  • लखनऊ की चिकनकारी और जरदोजी
  • कन्नौज का पारंपरिक इत्र (परफ्यूम)
  • भदोही के हस्तनिर्मित कालीन
  • फिरोजाबाद का कांच का सामान (ग्लासवेयर)
  • मुरादाबाद के मेटल हैंडीक्राफ्ट
  • मलिहाबाद का दशहरी आम
  • आगरा का पेठा
  • सहारनपुर की लकड़ी की कारीगरी
  • कानपुर की सैडलरी (चमड़े का सामान)

राज्य सरकार का एक्शन प्लान-
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर MSME विभाग ने एक विस्तृत एक्शन प्लान तैयार किया है, जिसका लक्ष्य है:

  • साल 2025-26 में 75 नए उत्पादों को GI टैग दिलाना.
  • इनमें से 25 उत्पादों के आवेदन GI रजिस्ट्री, चेन्नई में पहले ही फाइल किए जा चुके हैं.
  • इस तरह उत्तर प्रदेश जल्द ही देश का पहला ऐसा राज्य बन जाएगा, जिसके पास 152 GI टैग प्राप्त उत्पाद होंगे.

सिर्फ टैग मिलना काफी नहीं-
सरकार का फोकस सिर्फ नए GI टैग हासिल करने पर नहीं है, बल्कि पहले से मिले टैग्स का सही इस्तेमाल बढ़ाने पर भी है. इसके लिए:

  • GI प्रोडक्ट्स से जुड़े ज्यादा से ज्यादा उद्यमियों को "ऑथोराइज्ड यूजर" के तौर पर रजिस्टर किया जाएगा, जिससे वे कानूनी रूप से उस GI नाम का इस्तेमाल कर सकें.
  • MSME विभाग एक GI एक्सपर्ट संस्था, ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन के साथ मिलकर काम कर रहा है, ताकि उत्पादों की जागरूकता और मार्केटिंग बढ़ाई जा सके.

इससे फायदा क्या होगा?
GI टैग मिलने से उत्पाद के असली कारीगरों और उत्पादकों को कई फायदे होते हैं:

  • नकली या इमिटेशन प्रोडक्ट्स से कानूनी सुरक्षा मिलती है (जैसे बनारसी सिल्क की नकल सूरत में पावरलूम पर बनाई जाती है).
  • मार्केटिंग और निर्यात के मौके बढ़ते हैं.
  • ग्रामीण विकास को बढ़ावा मिलता है.
  • पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक जानकारी और शिल्प का संरक्षण होता है.

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