कल्पना कीजिए कि आप और आपका दोस्त एक ही समय पर एक ही दुकान से एक ही सामान खरीद रहे हैं लेकिन आप दोनों से अलग-अलग कीमत वसूली जा रही है. यही है सर्विलांस प्राइसिंग. अमेरिका के Maryland ने सर्विलांस प्राइसिंग पर रोक लगा दी है. मेरीलैंड में Protection from Predatory Pricing बिल पास किया है. इस कानून का मकसद रिटेल दुकानों, खासकर ग्रॉसरी स्टोर्स को इस बात से रोकना है कि वे ग्राहकों के निजी डेटा के आधार पर एक ही प्रोडक्ट के अलग-अलग दाम तय करें.
सर्विलांस प्राइसिंग क्या होती है?
सर्विलांस प्राइसिंग को डायनामिक प्राइसिंग या पर्सनलाइज्ड प्राइसिंग भी कहा जाता है. इसमें कंपनियां हर ग्राहक के बारे में जुटाए गए डेटा के आधार पर कीमत तय करती हैं.
यह डेटा क्या हो सकता है?
आपकी ऑनलाइन सर्च हिस्ट्री
आप कौन-कौन से प्रोडक्ट देखते हैं
आपकी लोकेशन
आपकी आमदनी का अनुमान
परिवार का आकार
खाने-पीने की पसंद
इन सब जानकारियों के आधार पर कंपनियां यह तय करती हैं कि आप किसी प्रोडक्ट के लिए कितनी कीमत देने को तैयार हैं और उसी हिसाब से आपको दाम दिखाया जाता है.
कहां-कहां इस्तेमाल होती है यह तकनीक?
सर्विलांस प्राइसिंग कोई नई चीज नहीं है. आप रोजाना इसका सामना करते हैं, भले ही आपको इसका एहसास न हो. जैसे फ्लाइट टिकट बुक करते समय कीमत बदलती रहती है. कैब बुकिंग ऐप्स इसका जमकर इस्तेमाल करते हैं. ई-कॉमर्स वेबसाइट्स भी इसे यूज करती हैं. इन प्लेटफॉर्म्स पर कीमतें डिमांड, टाइम और यूजर डेटा के आधार पर बदलती रहती हैं.
समस्या तब शुरू होती है जब यह तकनीक ग्रॉसरी स्टोर्स तक पहुंच जाती है. बड़ी रिटेल कंपनियां अब डिजिटल प्राइस टैग्स का इस्तेमाल कर रही हैं, जो रियल टाइम में कीमत बदल सकते हैं. इसका मतलब अगर सिस्टम को लगता है कि आप ज्यादा कीमत देने को तैयार हैं, तो आपको वही सामान महंगे में मिल सकता है, जबकि दूसरे ग्राहक को सस्ता.
भारत में क्या होता है?
भारत में अभी सर्विलांस प्राइसिंग को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं है, लेकिन इसके संकेत यहां भी देखने को मिलते हैं.
फ्लाइट और होटल बुकिंग में कीमत बदलती रहती है.
कैब ऐप्स में सर्ज प्राइसिंग आम है.
ऑनलाइन शॉपिंग में अलग-अलग यूजर्स को अलग ऑफर्स दिख सकते हैं.
कैसे पहचानें कि आपके साथ सर्विलांस प्राइसिंग हो रही है?
अगर आप किसी प्रोडक्ट, फ्लाइट या होटल को बार-बार सर्च करते हैं और हर बार कीमत बढ़ती दिखती है, तो यह सर्विलांस प्राइसिंग का संकेत है.
कभी मोबाइल पर देखी गई कीमत लैपटॉप या किसी दूसरे फोन पर अलग दिखे तो सम लीजिए डिवाइस या ब्राउजिंग डेटा के आधार पर कीमत बदली जा रही है.
कई बार जो यूजर किसी ऐप या वेबसाइट का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, उन्हें नए यूजर्स के मुकाबले कम ऑफर या ज्यादा कीमत दिखाई जाती है, क्योंकि कंपनी मानती है कि वे फिर भी उनसे ही सामान खरीदेंगे.
अगर आप और आपका दोस्त एक ही समय पर एक ही चीज चेक करते हैं और कीमत अलग-अलग दिखती है, तो यह साफ संकेत हो सकता है कि पर्सनलाइज्ड प्राइसिंग लागू है.
सर्विलांस प्राइसिंग से कैसे बचें?
जब भी फ्लाइट, होटल या ऑनलाइन शॉपिंग करें, ब्राउजर का incognito मोड इस्तेमाल करें.
वेबसाइट्स आपके ब्राउजिंग डेटा को cookies में सेव करती हैं. इन्हें समय-समय पर डिलीट करते रहें.
अगर आप बार-बार किसी चीज़ को देख रहे हैं, तो सिस्टम समझ जाता है कि आपकी खरीदने की इच्छा ज्यादा है. इसलिए तुरंत खरीदने के बजाय थोड़ा इंतजार करें.
हमेशा एक ही वेबसाइट पर भरोसा न करें. अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर कीमत की तुलना करें, ताकि आपको सही और सस्ती डील मिल सके.
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