CTC vs In Hand Salary: क्यों सैलेरी डेट पर बैंक में पैसा आता है कम.. जबकि ऑफर लेटर रकम बताता ज्यादा

पहली सैलेरी आने पर कई लोग इस बात को लेकर काफी कंफ्यूज रहते हैं कि ऑफर लेटर में तो कुछ और लिखा था, और आया कुछ और. वह इसके पीछे के टेक्निकल टर्म्स नहीं जानते है. अक्सर वह सीटीसी और इन हैंड सैलेरी के बीच का फर्क नहीं जानते हैं.

Difference Between CTC and In Hand (AI)
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 11 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:04 PM IST

जब भी कोई व्यक्ति नई नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाता है, तो एचआर अक्सर उसकी मौजूदा सीटीसी के बारे में पूछता है. इसके आधार पर ही नई कंपनी सैलेरी पैकेज तय करती है. लेकिन कई लोगों को यह समझ नहीं होती कि ऑफर लेटर में लिखी गई सीटीसी और हर महीने अकाउंट में आने वाली इन हैंड सैलेरी में इतना फर्क क्यों होता है. ऐसे में नौकरी करने वालों के लिए सीटीसी, ग्रॉस सैलेरी और नेट सैलेरी का मतलब समझना बेहद जरूरी है.

क्या होती है सीटीसी?
सीटीसी का पूरा नाम 'कॉस्ट टू कंपनी' होता है. इसका मतलब है कि कंपनी अपने एक वर्कर पर पूरे साल में कुल कितना खर्च करती है. इसमें केवल महीने की सैलेरी ही शामिल नहीं होती, बल्कि कंपनी द्वारा दिए जाने वाले कई अन्य फायदे और सुविधाएं भी जुड़ी होती हैं.

आसान भाषा में समझें तो सीटीसी आपका पूरे साल का सालाना सैलेरी पैकेज होता है. इसमें बेसिक सैलेरी, बोनस, पीएफ, मेडिकल इंश्योरेंस, ट्रैवल अलाउंस, मोबाइल बिल, फूड अलाउंस और अन्य बेनिफिट्स शामिल किए जाते हैं. यही वजह है कि ऑफर लेटर में दिखाई देने वाली सीटीसी अक्सर इन हैंड सैलेरी से ज्यादा होती है.

ग्रॉस सैलेरी में क्या-क्या शामिल होता है?
ग्रॉस सैलेरी वह अमाउंट होता है जो किसी कर्मचारी की पे स्लिप में दिखाई देती है. इसमें बेसिक सैलेरी के साथ सभी तरह के अलाउंस जुड़े होते हैं. जैसे हाउस रेंट अलाउंस, ट्रैवल अलाउंस, मेडिकल अलाउंस और अन्य सुविधाएं ग्रॉस सैलेरी का हिस्सा होती हैं. हालांकि ग्रॉस सैलेरी में टैक्स और अन्य कटौतियां शामिल नहीं होतीं. यानी यह वह रकम है जिसमें से बाद में जरूरी डिडक्शन काटे जाते हैं.

इन हैंड सैलेरी क्यों होती है कम?
इन हैंड सैलेरी या नेट सैलेरी वह रकम होती है जो हर महीने कर्मचारी के बैंक अकाउंट में आती है. यह राशि सभी जरूरी कटौतियों के बाद मिलती है. ग्रॉस सैलेरी से प्रोविडेंट फंड, प्रोफेशनल टैक्स, इनकम टैक्स और हेल्थ इंश्योरेंस जैसी रकम काटी जाती है. इसके बाद जो पैसा बचता है, वही कर्मचारी की नेट सैलेरी कहलाती है.

 

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