देश में सस्ती शिक्षा की बात होती है तो कभी पटना का मॉडल चर्चा में रहता था, लेकिन उत्तर प्रदेश के बदायूं में एक ऐसा प्रयोग चल रहा है, जहां शिक्षा सिर्फ सस्ती नहीं, बल्कि पूरी तरह निशुल्क है. यहां छात्रों से न पढ़ाई की फीस ली जाती है, न रहने का किराया. किताबें, लाइब्रेरी, मार्गदर्शन और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी तक सब कुछ मुफ्त उपलब्ध कराया जा रहा है.
15 जिलों से छात्र यहां पहुंच रहे
करीब 16 महीने पहले शुरू हुई यह पहल अब एक आंदोलन का रूप ले चुकी है. बदायूं समेत आसपास के लगभग 15 जिलों से छात्र यहां पहुंच रहे हैं. इनमें किसान, दिहाड़ी मजदूर और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे शामिल हैं. कई ऐसे छात्र भी हैं, जिन्होंने पैसों की कमी के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी, लेकिन अब वे दोबारा अपने सपनों को पूरा करने की तैयारी कर रहे हैं.
हॉस्टल मिला तो छोड़ दी नौकरी
छात्र अजय कुमार बताते हैं कि वे पहले दिल्ली में 12-12 घंटे नौकरी करते थे. हॉस्टल की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अब एयरफोर्स भर्ती की तैयारी कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर यह व्यवस्था न होती तो शायद पढ़ाई दोबारा शुरू करना संभव नहीं होता.
चार हजार किताबों की है लाइब्रेरी
यहां पढ़ाई केवल क्लासरूम तक सीमित नहीं है. कक्षाएं खत्म होने के बाद छात्र लाइब्रेरी में घंटों पढ़ाई करते हैं. करीब चार हजार किताबों वाली लाइब्रेरी, ग्रुप डिस्कशन रूम, मॉक इंटरव्यू और अनुभवी शिक्षकों का मार्गदर्शन छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करता है. यहां एकदिवसीय परीक्षाओं से लेकर पीसीएस और सिविल सेवा तक की तैयारी कराई जाती है.
समय के साथ छात्राओं की संख्या बढ़ी तो उनके लिए अलग आवास और किराये में 50 प्रतिशत आर्थिक सहायता की व्यवस्था भी शुरू की गई. छात्रा मानसी दीक्षित बताती हैं कि पिता के निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई थी. ऐसे में यह छात्रावास उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है.
न जाति न धर्म सिर्फ काबिलियत
इस पहल की सबसे बड़ी खासियत यहां का माहौल है. अलग-अलग जाति और धर्म के छात्र एक साथ रहकर पढ़ाई करते हैं. छात्र तरुण कुमार बताते हैं कि वे वाल्मीकि समाज से हैं, लेकिन संस्कृत में रुचि होने के कारण साथी उन्हें प्यार से "पंडित जी" कहकर बुलाते हैं. यहां पहचान जाति या धर्म से नहीं, बल्कि मेहनत और लक्ष्य से बनती है.
देश में नेताओं के नाम पर इमारतें और स्मारक बनते रहे हैं, लेकिन बदायूं का यह शिक्षण संस्थान एक अलग संदेश देता है. यह साबित करता है कि यदि अवसर बराबर मिले तो आर्थिक तंगी किसी भी बच्चे के सपनों की सबसे बड़ी बाधा नहीं बन सकती.
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