सरकारी स्कूल की इमारत भले ही बच्चों से दूर हो, लेकिन अगर पढ़ाने का जुनून हो तो शिक्षा बच्चों तक पहुंच ही जाती है. जालोर जिले काँगमाला के चकली बेरा भीलों की ढाणी में शिक्षा की ऐसी ही अनोखी तस्वीर सामने आई है. यहां करीब 50 बच्चों के लिए पूरी ढाणी ही स्कूल बन गई है. मिट्टी और झोपड़ी की दीवारों पर हिंदी-अंग्रेजी वर्णमाला, गिनती और पहाड़े लिखे गए हैं, ताकि बच्चों को पढ़ाई के लिए किसी बड़ी इमारत या आधुनिक क्लासरूम का इंतजार न करना पड़े.
स्कूल बंद हुआ तो शिक्षक ने ढाणी में शुरू कर दी पाठशाला
चकली बेरा भीलों की ढाणी में बच्चों की पढ़ाई को लेकर शिक्षक नारायण लाल जीनगर ने अनोखी पहल की. ‘अपनी ढाणी-अपना स्कूल’ की सोच के तहत शिक्षा को स्कूल की चारदीवारी से बाहर निकालकर बच्चों के घर तक पहुंचाने का प्रयास किया गया.
जहां बच्चों को नियमित रूप से पढ़ने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी, वहीं झोपड़ी की दीवारों को ही पढ़ाई का माध्यम बना दिया गया. दीवारों पर हिंदी की वर्णमाला से लेकर अंग्रेजी के अक्षर, गिनती और पहाड़े तक लिखे गए हैं. बच्चे इन्हीं दीवारों के बीच बैठकर पढ़ाई करते नजर आते हैं.
32 अनामांकित और ड्रॉपआउट बच्चों को स्कूल से जोड़ा
इस पहल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि केवल पहले से पढ़ रहे बच्चों तक ही शिक्षा सीमित नहीं रही. 32 अनामांकित और ड्रॉपआउट बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ा गया.दरअसल इस बस्ती में 15-20 साल से पानी की समस्या थी 15-20 घरों की बस्ती के लोग एक किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता था तो स्कूल जाने वाले बच्चे पूरे दिन घर के लिए बर्तनों से पानी लाते थे ऐसे में साक्षी फाउंडेशन के नेपाल सिंह देवल ने अपने खर्चे से पानी की पाइप लाइन अपने फॉर्म हाउस से उनकी बस्ती तक पहुंचाई और बच्चो को स्कूल से जोड़ा ही नहीं बल्कि पाँच साल तक गोद भी लिया
यानी जो बच्चे किसी वजह से शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर हो गए थे, उन्हें फिर से पढ़ाई से जोड़ने का प्रयास किया गया. फिलहाल करीब 50 बच्चे इस पहल से लाभान्वित हो रहे हैं.
झोपड़ी की दीवार बनी ब्लैकबोर्ड
इस पाठशाला की तस्वीरें सोशल मीडिया और लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं. कहीं बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ रहे हैं तो कहीं झोपड़ी की दीवार पर लिखे अक्षरों को देखकर सीख रहे हैं. इन दीवारों पर हिंदी-अंग्रेजी वर्णमाला, गिनती और पहाड़े लिखे गए हैं. यानी बच्चों के लिए यही दीवारें किताब भी हैं और ब्लैकबोर्ड भी.
शिक्षा के लिए शिक्षक के साथ ग्रामीण भी आए आगे
इस पहल में शिक्षक के साथ अभिभावकों और सामाजिक स्तर पर भी सहयोग मिला. साई फाउंडेशन के नेपाल सिंह देवल , भूगोल व्याख्याता प्रकाश कुमार और अभिभावकों के सहयोग से बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का प्रयास किया गया.
सिस्टम पर भी बड़ा सवाल
चकली बेरा की ये तस्वीर जहां एक शिक्षक की पहल की मिसाल पेश करती है, वहीं सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल भी खड़े करती है. आखिर ग्रामीण और दूरस्थ ढाणियों में रहने वाले बच्चों को पढ़ाई के लिए कच्ची झोपड़ी और मिट्टी की दीवारों का सहारा क्यों लेना पड़ रहा है? एक तरफ शिक्षा को डिजिटल और आधुनिक बनाने की बात होती है, वहीं दूसरी तरफ इन बच्चों की पाठशाला आज भी बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में है. फिर भी चकली बेरा की ये पहल बताती है कि सुविधाएं कम हों तो भी शिक्षा की राह बंद नहीं होती. जरूरत होती है एक ऐसी सोच की, जो स्कूल को बच्चों तक ले जाए. मिट्टी की दीवारों पर लिखे ये अक्षर सिर्फ वर्णमाला और पहाड़े नहीं हैं, बल्कि उन 50 बच्चों के बड़े सपनों की पहली सीढ़ी हैं.