पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनाव में RSS से जुड़े ABVP ने लगातार दूसरी बार अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की है. लेकिन इस जीत का असर सिर्फ कैंपस की राजनीति तक सीमित नहीं है. इस चुनाव ने पंजाब की राजनीति में भी नई चर्चा छेड़ दी है.
छात्र संघ अध्यक्ष बने अंकित विधान-
ABVP के उम्मीदवार अंकित बिढान ने अध्यक्ष पद पर जीत बरकरार रखी. इस चुनाव में शिरोमणि अकाली दल की छात्र इकाई स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया (SOI) ने ABVP का समर्थन किया. इसके बाद एक बार फिर BJP और अकाली दल के बीच संभावित नजदीकी को लेकर चर्चा शुरू हो गई है.
यूनिवर्सिटी में ABVP की लगातार दूसरी जीत-
अंकित बिढान को 3,149 वोट मिले. उन्होंने AAP से जुड़े ASAP के उम्मीदवार आदिल बराड़ को हराया, जिन्हें 2,637 वोट मिले. NSUI समर्थित उम्मीदवार गुरमन सिंह सिद्धू 2,263 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे.
यह ABVP की लगातार दूसरी बार अध्यक्ष पद पर जीत है. पिछले साल ABVP ने पहली बार अध्यक्ष पद जीतकर लंबे समय से चले आ रहे कांग्रेस समर्थित NSUI और क्षेत्रीय छात्र संगठनों के दबदबे को तोड़ा था.
किस पद पर किसको मिली जीत?
अध्यक्ष: अंकित बिढान, ABVP
उपाध्यक्ष: अरमान सिंह भिंडर, ASAP
सचिव: ध्यान सिंह (समीर), निर्दलीय NSUI समर्थित
संयुक्त सचिव: विशाल बामल, निर्दलीय, ASAP समर्थित गठबंधन
इससे यह भी साफ है कि ABVP ने पूरे कैंपस पर कब्जा नहीं किया है. उसने अध्यक्ष पद जीता, लेकिन बाकी तीन प्रमुख पद दूसरे गुटों के पास गए.
SOI के समर्थन से अकाली-BJP की चर्चा क्यों?
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा SOI के ABVP को समर्थन देने की रही. SOI आमतौर पर पंजाब यूनिवर्सिटी चुनाव में अलग से चुनाव लड़ता रहा है. लेकिन इस बार उसके अध्यक्ष पद के उम्मीदवार का नामांकन तकनीकी कारणों से खारिज हो गया. इसके बाद SOI ने ABVP उम्मीदवार अंकित बिधान का समर्थन किया. इस समर्थन ने अकाली दल और BJP के बीच संभावित नजदीकी की चर्चा को फिर हवा दे दी है.
साल 2020 में टूटा था BJP-अकाली गठबंधन-
BJP और अकाली दल लंबे समय तक सहयोगी रहे हैं. 2020 में कृषि कानूनों को लेकर दोनों पार्टियों के रिश्ते खराब हुए और गठबंधन टूट गया. अब 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले दोनों के बीच किसी संभावित समझौते पर नजर बनी हुई है.
हालांकि, पंजाब यूनिवर्सिटी चुनाव के इस समझौते को सीधे तौर पर BJP-SAD गठबंधन की वापसी का संकेत मानना जल्दबाजी होगी. SOI का फैसला उसके अपने उम्मीदवार के चुनाव से बाहर होने के बाद आया था. यह समझौता छात्र राजनीति से आगे बढ़ता है या नहीं, यह अभी साफ नहीं है.
BJP के लिए यह जीत क्यों महत्वपूर्ण है?
यह नतीजा BJP के लिए ऐसे समय आया है, जब युवाओं और छात्रों के बीच पार्टी की लोकप्रियता को लेकर बहस चल रही है. CJP के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन और उसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर BJP सरकार को लेकर राजनीतिक विवाद पैदा किया था. विपक्षी छात्र संगठनों ने चुनाव प्रचार के दौरान इन मुद्दों को BJP के खिलाफ इस्तेमाल किया.
इसके बावजूद ABVP की जीत BJP को एक अलग राजनीतिक संदेश देने का मौका देती है. BJP यह तर्क दे सकती है कि हाल के विरोध प्रदर्शनों के बावजूद युवाओं का एक हिस्सा अब भी उसके छात्र संगठन के साथ है. इसलिए पंजाब यूनिवर्सिटी का नतीजा BJP के लिए सिर्फ एक छात्र चुनाव की जीत नहीं, बल्कि कैंपस में अपनी संगठनात्मक पकड़ और युवाओं के बीच समर्थन दिखाने का मौका भी है.
क्या पंजाब यूनिवर्सिटी अब 'सैफ्रन कैंपस' बन रहा है?
पंजाब यूनिवर्सिटी में लंबे समय से NSUI और क्षेत्रीय छात्र संगठनों का प्रभाव रहा है. SOPU जैसे क्षेत्रीय संगठन भी यहां मजबूत रहे हैं.
अब यह तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है.
ABVP की लगातार दो अध्यक्ष पद की जीत बताती है कि संगठन अब कैंपस में सिर्फ बाहरी ताकत नहीं रहा. उसने खुद को एक मजबूत राजनीतिक शक्ति के तौर पर स्थापित किया है. लेकिन इसे पूरी तरह 'भगवा कब्जा' कहना भी सही नहीं होगा.
NSUI समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार ने सचिव पद जीता, जबकि ASAP समर्थित उम्मीदवारों ने उपाध्यक्ष और संयुक्त सचिव के पद अपने नाम किए. इसलिए ज्यादा सही तस्वीर यह है कि कैंपस का वोटर पूरी तरह किसी एक संगठन के साथ नहीं है. हालांकि, सबसे महत्वपूर्ण और सबसे ज्यादा दिखाई देने वाले अध्यक्ष पद पर ABVP ने अपनी मजबूत पकड़ बना ली है.
DUSU चुनाव से पहले NSUI के लिए खतरे की घंटी?
पंजाब यूनिवर्सिटी का नतीजा दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ यानी DUSU चुनाव से पहले भी महत्वपूर्ण है. DUSU चुनाव 18 सितंबर को होने हैं.
NSUI के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी का नतीजा चिंता बढ़ाने वाला हो सकता है. उसके समर्थित उम्मीदवार को अध्यक्ष पद पर तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा, जबकि ABVP ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की.
हालांकि, पंजाब यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी की राजनीति काफी अलग है. इसलिए PU के नतीजे के आधार पर DUSU चुनाव का अनुमान लगाना सही नहीं होगा. लेकिन राजनीतिक कहानी जरूर महत्वपूर्ण है. अगर ABVP पंजाब यूनिवर्सिटी की जीत को BJP के लिए युवाओं और Gen Z के समर्थन के तौर पर पेश करती है, तो NSUI पर यह साबित करने का दबाव होगा कि ABVP की यह बढ़त पूरे छात्र समुदाय की सोच को नहीं दिखाती.
बड़ा राजनीतिक संकेत क्या है?
पंजाब यूनिवर्सिटी का चुनाव सिर्फ चार छात्र पदों का चुनाव नहीं है. इसके तीन बड़े राजनीतिक संकेत हैं.
पहला, ABVP ने ऐसे कैंपस में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है जहां वह कभी कमजोर ताकत मानी जाती थी.
दूसरा, SOI के समर्थन ने अकाली दल और BJP के बीच संभावित नजदीकी की चर्चा फिर शुरू कर दी है. हालांकि, अभी किसी औपचारिक गठबंधन का कोई प्रमाण नहीं है.
तीसरा, BJP को यह कहने का मौका मिला है कि हाल के छात्र आंदोलनों के बावजूद युवाओं के बीच पार्टी का समर्थन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव और सितंबर में होने वाले DUSU चुनाव से पहले पंजाब यूनिवर्सिटी का नतीजा कैंपस की राजनीति में एक शुरुआती संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ABVP की यह 'भगवा बढ़त' सिर्फ चंडीगढ़ के कैंपस तक सीमित रहेगी या आने वाले दिनों में यह छात्र राजनीति का बड़ा ट्रेंड बनेगी?
ये भी पढ़ें: