UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में साल 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं. इस चुनाव में जीत दर्ज करने को लेकर सभी प्रमुख राजतीनिक दल सड़क पर उतर गए हैं. सत्ताधारी बीजेपी लखनऊ से लेकर दिल्ली तक लगातार बैठकें कर रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कैबिनेट विस्तार के बाद बीजेपी का पूरा ध्यान संगठन को मजबूत करने और राज्य भर में अपने बूथ नेटवर्क को कसने पर है.
सीएम योगी प्रदेश में दौरा पर दौर कर रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह भी अब पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश पर लगा दिए हैं. उधर, अखिलेश यादव सत्ता में वापसी का रास्ता तलाश रहे हैं. मायावती भी बीएसपी में जान फूंकने की तैयारी कर रही हैं. कांग्रेस भी जोर शोर से तैयारी में लगी है. विधानसभा चुनाव 2027 के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने खास रणनीति बनाई है. बीजेपी सबसे पहले उन 61 विधानसभा सीटों पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जहां वह पिछले तीन विधानसभा चुनावों 2012, 2017 और 2022 में एक बार भी जीत दर्ज नहीं कर पाई है.
61 सीटों पर जीत बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती
बीजेपी के लिए विधानसभा चुनाव 2027 में 61 सीटों पर जीत बड़ी चुनौती है. इन सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए BJP ने मास्टर प्लान तैयार कर लिया है. बीजेपी के लिए चुनौती बनी सीटों में से सबसे बड़ा हिस्सा अवध और मध्य यूपी से आता है. यहां की 26 सीटें मुश्किल लिस्ट में शामिल हैं. पूर्वांचल की (आजमगढ़, मऊ, जौनपुर और गाजीपुर जैसे प्रमुख जिलों) 22 सीटें बीजेपी की मुश्किल लिस्ट में शामिल हैं.
पश्चिमी यूपी (सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली) की 13 सीटें भारतीय जनता पार्टी के लिए विधानसभा चुनाव 2027 में सबसे कठिन परीक्षा साबित होने वाली हैं. इन 61 सीटों में से 27 सीटें अकेले अखिलेश यादव की पार्टी सपा के पास है. कुछ सीटें कांग्रेस, बहुजन समाजवादी पार्टी व निर्दलीय उम्मीदवारों के पास हैं. बीजेपी के लिए राहत की बात है कि गत दिनों हुए उपचुनावों में भाजपा कुंदरकी और रामपुर जैसी मुश्किल सीटों पर जीत मिली है. सुआर सीट पर भी बीजेपी ने बाजी मारी है. इससे बीजेपी ने नेताओं और कार्यकर्ताओं का का हौसला बढ़ा है. हालांकि अभी चुनौती बाकी है.
61 सीटों पर जटिल है जातीय गणित
इन 61 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज करने में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी बाधा यहां का जटिल जातीय गणित है. आपको मालूम हो कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की ताकत एक खास सोशल इंजीनियरिंग है. इसे गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित का गठबंधन कहा जाता है. कुछ विधानसभा क्षेत्रों में पसमांदा मुसलमान भी बीजेपी को वोट देते हैं. सामान्य वर्ग अधिकतर मतदाता बीजेपी के साथ रहते हैं. लेकिन इन 61 सीटों पर आते ही यह पूरा समीकरण मानों बिखर जाता है क्योंकि इन सीटों पर एक खास जातीय पैटर्न काम करता है. अलग-अलग सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक इन 61 सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं का लगभग 76 फीसदी वोट सीधे विपक्ष को जाता है.
इतना ही नहीं यादवों का 72 फीसदी व जाटव दलितों का 74 फीसदी वोट भी विपक्ष के खाते में चला जाता है. इस तरह से इन सीटों पर भाजपा के खिलाफ एकमुश्त वोटिंग होती है. यही वोट बैंक बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती है. यहां चुनावी लहर के बावजूद बीजेपी के सारे गणित फेल होते दिखते हैं. इन सीटों पर जीत के लिए बीजेपी ने अब अपनी जातीय इंजीनियरिंग का तरीका बदल दिया है. 10 मई 2026 को यूपी में कैबिनेट विस्तार किया गया. इस नए मंत्रिमंडल के जरिए हर वर्ग को साधने की कोशिश की गई है. गैर-यादव OBC और अनुसूचित जातियों (SC) पर खासा फोकस किया गया. इस कदम को समाजवादी पार्टी के PDA अभियान का मुकाबला करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. इतना ही नहीं भारतीय जनता पार्टी अब दो अलग-अलग कंपनियों से अपने विधायकों का गुप्त सर्वे भी करा रही है. इसका उद्देश्य खराब छवि वाले नेताओं के टिकट काटना है.
बीजेपी ने क्या बनाया है प्लान
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने नेताओं से चुनाव अभियान के शुरुआत में इन कमजोर और मुश्किल सीटों को प्राथमिकता देने को कहा है. भारतीय जनता पार्टी की योजना इन सीटों से चुनावी डेटा, जातिगत समीकरण और बूथ लेवल का फीडबैक एकत्र करने की है, ताकि हर सीट के हिसाब से एक अलग और खास रणनीति बनाई जा सके. आपको मालूम हो कि यूपी विधानसभा चुनाव 2017 बीजेपी ने हिंदुत्व और विकास के मुद्दे पर 312 सीटें जीती थीं, लेकिन विधानसभा चुनाव 2022 में जीत का यह आंकड़ा घटकर 255 पर आ गया था. ऐसे में बीजेपी संगठन का मुख्य काम इस गिरावट को रोकना है. यूपी के राजनीति के जानकारों का मानना है कि विपक्ष जिस तरह से जातिगत समीकरणों को साधकर गठबंधन बना रहा है, उसे देखते हुए यदि भाजपा के वोट बैंक में थोड़ी भी सेंध लगती है तो विधानसभा चुनाव 2027 में बड़ा नुकसान हो सकता है.
ऐसे में बीजेपी बूथ मैनेजमेंट सुधारने, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों तक पहुंच बढ़ाने और सहयोगियों के साथ तालमेल बेहतर करने पर जोर दे रही है. बीजेपी ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) और जयंत चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल जैसे दलों को अपने साथ लाने में कामयाब रही है, जो 2022 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ थे. इस बदलाव से भाजपा को उन इलाकों में नुकसान कम करने में मदद मिल सकती है, जहां जातिगत समीकरण खेल बिगाड़ते रहे हैं. बीजेपी पिछड़ी जातियों को दोबारा जोड़ने के लिए पूरा जो लगा रही है, जो पिछले चुनाव में विपक्ष की तरफ झुकी दिख रही थीं. भारतीय जनता पार्टी अपनी 3 एस संगठन, सरकार और संघ (RSS) की की रणनीति को आगे बढ़ाने पर विचार कर रही है. इसके अलावा बीजेपी की फ्लोटिंग वोटर्स पर भी नजर है क्योंकि विधानसभा चुनाव 2027 का अंतिम नतीजा फ्लोटिंग वोटर्स (ऐसे वोटर जो किसी एक पार्टी से बंधे नहीं होते) पर निर्भर कर सकता है, खासकर कुर्मी, मौर्य और लोधी जैसे गैर-यादव OBC समूहों और पासी, वाल्मीकि और धोबी जैसे गैर-जाटव दलित समुदायों पर. ये समूह किसी एक पार्टी से स्थायी रूप से नहीं जुड़े हैं. बीजेपी इन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश में लगी हुई है.
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