Kurmis and Pasis are the kingmakers in the UP Elections: उत्तर प्रदेश में अगले साल यानी 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं. सूबे में अभी से सियासी पारा चढ़ गया है. भाजपा, सपा, कांग्रेस, बसपा से लेकर छोटे दल तक मतदाताओं को लुभाने में जुट गए हैं. देश के अन्य राज्यों की तरह यूपी में भी जाति आधारित चुनावी राजनीति हर इलेक्शन में हावी रहती है. इस बार चुनाव में भाजपा, सपा से लेकर हर दल की नजर कुर्मी और पासी समाज पर है. भारतीय जनता पार्टी और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की इन दोनों जातियों पर विशेष नजर है.
आपको मालूम हो कि यूपी में विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव हर चुनाव में कुर्मी और पासी किंगमेकर की भूमिका निभाते हैं. ऐसे में भाजपा और सपा के रणनीतिकार मान रहे हैं कि इस बार भी विधानसभा चुनाव में जीत दिलाने में मुख्य भूमिका कुर्मी और पासी बिरादरियों के मतदाता ही निभाएंगे.कुर्मी और पासी समाज के अधिकतर लोग भाजपा से जुड़ाव रखते हैं. ऐसे में भाजपा ने जहां अपने इस वोट बैंक को साधे रखने की तो सपा ने सेंध लगाने की रणनीति बनाई है. भाजपा ने विधानसभा चुनाव 2027 से कुर्मी समाज को अपने साथ बनाए रखने के लिए जहां पंकज चौधरी को कमान सौंपी है तो वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी कुर्मी वोटरों को साधने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं.
यूपी में कितनी है कुर्मी और पासी जाति की आबादी
यूपी में 2011 की जनगणना के मुताबिक पासी जाति की आबादी 6522166 थी. यूपी की सियासत में कुर्मी, यादवों के बाद OBC की दूसरी सबसे बड़ी जाति है. साल 2001 में यूपी सरकार की बनाई हुकुम सिंह कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक कुर्मी की आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 7.4% है. 2011 जनगणना में यूपी की कुल आबादी करीब 20 करोड़ थी. 2026 की अनुमानित आबादी करीब 25 करोड़ हो सकती है. इस हिसाब से यूपी में कुर्मी की आबादी करीब 1.75 से 2 करोड़ के बीच मानी जाती है.
यूपी में कुर्मी और पासी जाति क्यों इतनी महत्वपूर्ण
यूपी चुनाव में कुर्मी और पासी जाति जीत और हार तय करती है. ऐसे में ये दोनों जातियां काफी महत्वपूर्ण हैं. बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यूपी भाजपा अध्यक्ष बनाकर 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कुर्मी जाति को बड़ा संदेश दिया है. सूबे की राजनीति में कुर्मी समाज की आबादी भले ही लगभग 8 प्रतिशत हो, लेकिन यूपी में कुर्मी मतदाता पूर्वांचल, अवध, मध्य यूपी और बुंदेलखंड में 128 सीटों पर प्रभावी भूमिका रखते हैं जबकि 48-50 सीटों पर वे निर्णायक असर रखते हैं.
ऐसे में सभी दल कुर्मी समाज को अपनी तरफ करने में लगे हुए हैं. उधर, उत्तर प्रदेश में पासी जाति के मतदाताओं का मजबूत प्रभाव अवध और पूर्वांचल में देखने को मिलता है. लखनऊ, रायबरेली, अमेठी, बाराबंकी, हरदोई, उन्नाव, सीतापुर, कौशांबी, प्रयागराज, फतेहपुर, बस्ती, गोंडा और प्रतापगढ़ जैसे जिलों में पासी मतदाता जीत-हार में अहम भूमिका निभाते हैं. राज्य की कम से कम 103 विधानसभा सीटों के चुनावी नतीजों में इनकी अहम भूमिका रहती है. वहीं करीब 60 से 70 विधानसभा सीटों और 12 से 15 लोकसभा सीटों पर पासी मतदाता जीत-हार में बेहद निर्णायक माने जाते हैं. ऐसे में दलित समुदाय के भीतर दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाली पासी जाति को सभी दल अपने पाले में करना चाहते हैं.
इस जाति के उम्मीदवारों पर होगी टिकटों की बारिश
आपको मालूम हो कि यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में 17 यादव की तुलना में 34 कुर्मी विधायक जीते थे. इस चुनाव में सिर्फ 4 फीसदी की आबादी वाली पासी बिरादरी के 15 विधायक जीते थे. यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में 25 यादव की तुलना में 40 कुर्मी और 25 पासी विधायक चुनाव जीतक विधानसभा पहुंच गए. ऐसे में इन दोनों जातियों के उम्मीदवारों का जीत प्रतिशत बहुत ही अच्छा है. इसको देखते हुए लग रहा है कि विधानसभा चुनाव 2027 में इन दोनों जातियों के उम्मीदवारों पर टिकटों की बरसात हो सकती है.
यूपी की सियासत में कुर्मी और पासी की बढ़ी धमक
आपको मालूम हो कि बीजेपी की गैरयादव ओबीसी-गैरजाटव दलित की नई सोशल इंजीनियरिंग के कारण यूपी की सियासत में यादव और मुस्लिम से कम आबादी के बावजूद कुर्मी और पासी की धमक बढ़ी है. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ये दोनों जातियां बीजेपी के पाले में चली गईं. हालांकि 2024 के चुनाव में इन जातियों को साधने के लिए टिकट बांटने का सपा का फार्मूला सफल रहा था. हालांकि इन दोनों जातियों के मतदाताओं का चुनावी पैटर्न पिछले कुछ चुनावों से बदल गया है. इन दोनों जातियों के लोग अब किसी दल को देखकर नहीं बल्कि अपनी-अपनी जाति के उम्मीदवारों को वरीयता दे रहे हैं. यही कारण हैं कि गत लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के 12 कुर्मी उम्मीदवारों में से 7 चुनाव जीतने में सफल हुए थे.
उधर, इस जाति को उम्मीदवारों को टिकट देने में पिछड़ी बीजेपी ने सिर्फ कुर्मी जाति से 5 उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारे थे, जिसमें से सिर्फ 3 सीट पर बीजेपी को जीत मिली. ऐसे में इस बार विधानसभा चुनाव में कुर्मी जाति के अधिक से अधिक उम्मीदवारों को टिकट मिलने की संभावना है. आपको मालूम हो कि बीजेपी का कुर्मी कार्ड विधानसभा चुनाव 2022 में सफल रहा था. उस समय बीजेपी को 403 में से 255 सीटों पर जीत मिली थी. 2022 में भाजपा के सबसे अधिक 27 कुर्मी विधायक चुने गए. 2024 के झटके के बाद अब 2027 चुनाव से पहले कुर्मी समाज को फिर साधने के लिए बीजेपी कमर कस चुकी है. कुर्मी समाज भाजपा की नई रणनीति का केंद्र बनी है. उधर, कुर्मी वोटरों को साधने के लिए अखिलेश यादव भी जोर लगा रहे हैं. अखिलेश यादव ने अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नारे के तहत पारंपरिक 'यादव-मुस्लिम' (Y-M) समीकरण से आगे बढ़कर गैर-यादव पिछड़ों, विशेषकर कुर्मी (पटेल) समाज को तरजीह दी है.
अभी किस दल में कितने कुर्मी विधायक और सांसद
वर्तमान समय में यूपी के 403 विधायकों में कुर्मी/पटेल की संख्या 40 है. इसमें भाजपा से 27, सपा से 12 और कांग्रेस से 1 विधायक हैं. 100 एमएलसी में 5 कुर्मी समाज से हैं. यूपी की 80 लोकसभा सीटों में भी 11 सांसद कुर्मी समाज से हैं. इसमें सपा से 7, भाजपा के 3 और अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल सांसद हैं. विधायकों में ब्राह्मण के बाद सबसे अधिक कुर्मी विधायक हैं. जबकि सांसदों में ब्राह्मणों के बराबर इनकी संख्या है.