Advertisement

BSP के गढ़ में दलित वोटों पर SP की नजर, 15 नवंबर को बड़े सम्मेलन से पश्चिमी यूपी में सेंध की तैयारी

बहुजन समाज पार्टी (BSP) के गढ़ में समाजवादी पार्टी (SP) एक बड़ा दलित सम्मेलन करने जा रही है. 15 नवंबर को होने वाले इस सम्मेलन की तैयारी शुरू हो गई है. समाजवादी पार्टी इस सम्मेलन के जरिए पश्चिमी यूपी के दलित वोटों को रिझाने की कोशिश करेगी.

Akhilesh Yadav
कुमार अभिषेक/अरविंद शर्मा
  • लखनऊ/आगरा,
  • 14 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:41 PM IST

15 नवंबर को आगरा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा दलित सम्मेलन होने जा रहा है. इस सम्मेलन में पश्चिमी यूपी के अलग-अलग जिलों से जाटव और दूसरे दलित समाज के लोगों को एक मंच पर लाने की रणनीति तैयार की जाएगी.

BSP के गढ़ में समाजवादी पार्टी की दलित सम्मेलन-
सूत्रों का कहना है कि सम्मेलन आगरा के भारी भरकम जीआईसी मैदान में होगा. मकसद साफ है- दलित समाज के बीच समाजवादी पार्टी की जमीन मजबूत करना और 2027 के विधानसभा चुनाव में सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ना. यानी जिस वोट बैंक पर अब तक दूसरी पार्टियों खासकर बीएसपी का मजबूत दावा माना जाता रहा है, उसमें सेंध लगाने के लिए सपा ने कमर कस ली है. सियासत में कहते हैं कि जहां वोट का गणित बदलता है, वहीं सत्ता का भूगोल भी बदल जाता है और समाजवादी पार्टी अब पश्चिमी यूपी में इसी गणित को साधने की कोशिश करती दिखाई दे रही है.

पश्चिमी यूपी में कितनी है दलित आबादी?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित आबादी का आंकड़ा भी इस राजनीतिक कवायद की अहमियत बताता है. 2011 की जनगणना के मुताबिक आगरा में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 22.43 प्रतिशत है. सहारनपुर में यह करीब 22.05 प्रतिशत, बिजनौर में करीब 22 प्रतिशत, हाथरस में करीब 22 प्रतिशत, अलीगढ़ में करीब 20.56 प्रतिशत, बदायूं में करीब 19.90 प्रतिशत, मुजफ्फरनगर में करीब 19.56 प्रतिशत और बरेली में करीब 20 प्रतिशत के आसपास है. मथुरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी और बुलंदशहर जैसे जिलों में भी दलित आबादी का प्रतिशत महत्वपूर्ण है. वहीं मेरठ में करीब 14 से 15 प्रतिशत, रामपुर में करीब 13 प्रतिशत और बागपत तथा शामली में करीब 11 प्रतिशत के आसपास अनुसूचित जाति की आबादी है. इन आंकड़ों को अगर पश्चिमी यूपी के विधानसभा क्षेत्रों के चुनावी गणित से जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर साफ होती है कि दलित वोट बैंक कई सीटों पर जीत-हार का अंतर तय करने की ताकत रखता है. हालांकि ये 2011 की जनगणना के आंकड़े हैं और इन्हें मौजूदा मतदाता सूची में दलित वोटरों के सटीक प्रतिशत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.

मिशन की कमान रामजीलाल सुमन के पास-
समाजवादी पार्टी के इस मिशन की कमान राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन संभाल रहे हैं. पिछले काफी समय से सुमन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़न से जुड़े मामलों को लेकर लगातार मैदान में नजर आए हैं. जहां कहीं दलितों पर अत्याचार या उत्पीड़न की शिकायत सामने आई, वहां रामजीलाल सुमन मौके पर पहुंचे, पीड़ित परिवार से मिले और सरकार को घेरने की कोशिश की. कई मौकों पर उनके सामने पुलिस प्रशासन भी खड़ा हुआ, कहीं रास्ता रोकने की कोशिश हुई तो कहीं पुलिस से आमना-सामना भी देखने को मिला. लेकिन सियासत में कहते हैं कि बूंद-बूंद से घड़ा भरता है और रामजीलाल सुमन लंबे समय से पश्चिमी यूपी के दलित इलाकों में लगातार दौरा कर उसी राजनीतिक जमीन को तैयार करने में जुटे हैं.

दलितों को रिझाने की कोशिश-
अब उसी मेहनत को संगठन और बड़े राजनीतिक मंच में बदलने की तैयारी है. आगरा में होने वाला यह दलित सम्मेलन महज एक सम्मेलन नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के लिए पश्चिमी यूपी में दलित राजनीति की नई बिसात बिछाने की कोशिश माना जा रहा है. पार्टी दलित समाज को यह संदेश देने की तैयारी में है कि समाजवादी पार्टी उनके मान-सम्मान, स्वाभिमान और अधिकारों की लड़ाई में उनके साथ खड़ी है. सम्मेलन में दलित समाज के सामने आने वाली समस्याओं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मौजूदा कार्यकाल के दौरान सामने आए दलित उत्पीड़न के मामलों को मुद्दा बनाया जाएगा. यानी सपा अब केवल चुनावी मंच से दलितों की बात करने के बजाय जमीन पर हुए संघर्षों को अपनी राजनीतिक पूंजी बनाने की कोशिश कर रही है.

अखिलेश यादव होंगे मुख्य अतिथि-
इस सम्मेलन में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मुख्य अतिथि होंगे. अखिलेश यादव की मौजूदगी इस सम्मेलन को और बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है. एक तरफ रामजीलाल सुमन पश्चिमी यूपी में दलित समाज के बीच लगातार सक्रियता के जरिए जमीन तैयार कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव उस जमीन को पार्टी के बड़े राजनीतिक अभियान से जोड़ने की कोशिश करेंगे. सपा की रणनीति में जाटव समाज के साथ-साथ दूसरे दलित समुदायों को भी अपने साथ जोड़ना अहम होगा, क्योंकि पश्चिमी यूपी का दलित वोट एकमुश्त किसी एक राजनीतिक खेमे में नहीं है और अलग-अलग इलाकों में उसका चुनावी व्यवहार अलग-अलग रहा है.

सवाल सिर्फ सम्मेलन में भीड़ जुटाने का नहीं है, असली सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी दलित समाज के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता को वोट में बदल पाएगी? क्या रामजीलाल सुमन की जमीन पर की गई सक्रियता 2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के लिए वोटों की ताकत बनेगी? क्या अखिलेश यादव का मंच दलितों के बीच सपा के पुराने समीकरणों से अलग एक नया भरोसा पैदा कर पाएगा? और सबसे बड़ा सवाल- क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित वोट के समीकरण में समाजवादी पार्टी इतनी बड़ी सेंध लगा पाएगी कि 2027 के विधानसभा चुनाव का गणित बदल जाए? क्योंकि सियासत में एक कहावत है- ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’. लेकिन चुनावी लोकतंत्र में असली लाठी मतदाता का वोट है. पश्चिमी यूपी में दलित वोट अगर किसी एक दिशा में निर्णायक रूप से मुड़ता है तो कई सीटों पर चुनावी तस्वीर बदल सकती है. समाजवादी पार्टी अब इसी संभावना को तलाश रही है. 15 नवंबर का आगरा सम्मेलन बताएगा कि यह सिर्फ सियासी शोर है या आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की दस्तक.

ये भी पढ़ें:

 

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Advertisement