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बिना विधायकी यूपी में CM की कुर्सी पर बैठे ये 7 लीडर, जानें उनके बारे में सबकुछ

अखिलेश यादव ने बिना चुनाव लड़े ही मुख्यमंत्री बनने को खुद के लिए शुभ बताया. इसके बाद यूपी की सियासत में इसको लेकर चर्चा शुरू हो गई है. उत्तर प्रदेश में कई मुख्यमंत्री हुए हैं, जो बिना विधानमंडल के सदस्य रहे मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है. चलिए उनके बारे में बताते हैं.

Mayawati, Yogi Adityanath and Akhilesh Yadav
समर्थ श्रीवास्तव
  • लखनऊ,
  • 04 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:55 AM IST

अखिलेश यादव के विधान सभा चुनाव लड़े बिना एक सांसद की हैसियत से यूपी के चुनावी समर में उतरने के ऐलान के बाद से सियासी चर्चाएं तेज हो गई हैं. हालांकि ये पहली बार नहीं है, जब कोई नेता बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य है मुख्यमंत्री की दावेदारी पेश कर रहा है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना और विधानसभा का सदस्य (विधायक) होना हमेशा एक साथ नहीं चला. संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई भी गैर-सदस्य 6 महीने तक मुख्यमंत्री रह सकता है, बशर्ते वह इस अवधि के भीतर किसी सदन की सदस्यता हासिल कर ले.

यूपी के राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई मौके आए जब नेताओं ने बिना विधानसभा का सदस्य रहते मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इनमें से कुछ ने बाद में उपचुनाव जीतकर विधानसभा का रुख किया, तो कइयों ने विधान परिषद (उच्च सदन) का सुरक्षित रास्ता चुना.

त्रिभुवन नारायण सिंह-
त्रिभुवन नारायण सिंह यूपी के पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे जो शपथ लेते समय राज्य के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. 18 अक्टूबर 1970 को पद संभालने के बाद संवैधानिक अनिवार्यता पूरी करने के लिए उन्होंने गोरखपुर की मानीराम विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा. हालांकि, इस चुनाव में उन्हें कांग्रेस (आर) के रामकृष्ण द्विवेदी के हाथों हार का सामना करना पड़ा. चुनाव हारते ही उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

मायावती-
बीएसपी लीडर मायावती 2 बार बिना विधानमंडल की सदस्य रहे मुख्यमंत्री पद की शपथ ली हैं. गेस्ट हाउस कांड के बाद जून 1995 में जब भाजपा के समर्थन से मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, तब वे विधायक नहीं बल्कि राज्यसभा सांसद थीं. हालांकि यह सरकार केवल सवा चार महीने ही चल सकी. साल 2007 में जब बसपा को पूर्ण बहुमत मिला, तब भी मायावती विधानसभा सदस्य नहीं थीं. मायावती संसद के उच्च सदन में थीं. पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने के लिए उन्होंने उपचुनाव लड़ने के बजाय विधान परिषद (MLC) की सदस्यता ली.

राम प्रकाश गुप्ता-
नवंबर 1999 में जब भाजपा ने कल्याण सिंह को हटाकर राम प्रकाश गुप्ता को सत्ता की कमान सौंपी, तब वे सक्रिय राजनीति से लगभग दूर थे और राज्य के किसी सदन के सदस्य नहीं थे. सीएम बनने के बाद उन्होंने विधान परिषद का रास्ता चुना और MLC बने.

राजनाथ सिंह-
अक्टूबर 2000 में जब राजनाथ सिंह ने पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब वे केंद्र में भूतल परिवहन मंत्री और राज्यसभा सांसद थे. सीएम बनने के बाद उन्होंने बाराबंकी की हैदरगढ़ विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा, जीत दर्ज की और विधायक के रूप में सदन में पहुंचे.

मुलायम सिंह यादव-
अगस्त 2003 में जब सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने तीसरी बार यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब वे संभल से लोकसभा सांसद थे. संवैधानिक बाध्यता पूरी करने के लिए उन्होंने बदायूं (वर्तमान संभल) की गुन्नौर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा और रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल कर विधायक बने.

अखिलेश यादव-
साल 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला. पार्टी ने युवा चेहरे के रूप में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री चुना. शपथ के समय वे कन्नौज से लोकसभा सांसद थे. बाद में उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा देकर विधान परिषद (MLC) के जरिए सदन की सदस्यता ली.

योगी आदित्यनाथ-
2017 में जब भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल किया, तब गोरखपुर से पांच बार के लोकसभा सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया. शपथ ग्रहण के समय वे किसी भी राज्य सदन के सदस्य नहीं थे. बाद में उन्होंने विधान परिषद (MLC) की सदस्यता ग्रहण की. हालांकि इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में वे सीधे गोरखपुर शहर सीट से लड़े, विधायक बने और दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली.

उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि सूबे की शीर्ष कुर्सी तक पहुंचने के लिए सीधे चुनाव मैदान में उतरना ही एकमात्र रास्ता नहीं रहा है. 2007 से 2017 के एक दशक तक तो यूपी में विधान परिषद (MLC) के रास्ते ही मुख्यमंत्री राजभवन तक पहुंचे.

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