West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटों में से 152 सीटों पर पहले चरण में मतदान संपन्न हो चुका है. अब दूसरे और आखिरी चरण में 142 सीटों पर वोटिंग 29 अप्रैल 2026 को होनी है. 4 मई 2026 को नतीजे आएंगे. किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए 148 सीटों का बहुमत हासिल करना जरूरी है. पहले चरण में पश्चिम बंगाल के लोगों ने रिकॉर्ड तोड़ मतदान करके इतिहास रच दिया है. इस रिकॉर्ड वोटिंग से सभी पार्टियां गदगद हैं.
भारतीय जनता पार्टी (BJP) जहां इसे अपने पक्ष में बता रही है तो वहीं ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) भी इसे अपने पक्ष में बता रही है. बढ़ा मतदान बदलाव की तरफ या बीजेपी की है लहर, यह चारों तरफ चर्चा का विषय है. पहले चरण के चुनाव के बाद गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि दीदी यानी ममता बनर्जी जाने वाली हैं और भाजपा आने वाली है. गृह मंत्री शाह ने कहा कि TMC का सूरज ढल चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि टीएमसी का दीया बुझने से पहले फड़फड़ा रहा है. बीजेपी 152 में से 110 सीटों पर जीत दर्ज करने का दावा कर रही है. उधर, ममता बनर्जी ने कहा कि रिकॉर्ड वोटिंग से उनकी जीत पक्की है. ममता बनर्जी ने कहा बंगाल की जनता ने SIR के खिलाफ बंपर वोटिंग की है. टीएमसी पहले चरण में 125 सीटों पर जीत दर्ज करने का दावा कर रही है. आपको मालूम हो कि बंपर वोटिंग का मतलब हमेशा एक जैसा नहीं होता. पश्चिम बंगाल का चुनावी इतिहास साक्षी है कि कभी रिकॉर्ड वोटिंग से सरकार गिरी है, तो कभी सत्तारूढ़ पार्टी की सीट में इजाफा भी हुआ है. आइए जानते हैं ऐतिहासिक वोटिंग के क्या मायने हैं और इससे बीजेपी या ममता किसे मिलेगा फायदा? आपको मालूम हो कि विधानसभा चुनाव 2021 में टीएमसी ने 213 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया था. उधर, भाजपा 77 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी.
कुल इतने मतदाताओं ने अपने मताधिकार का किया उपयोग
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में कुल 3.6 करोड़ मतदाताओं में से 92.88 प्रतिशत लोगों ने वोट दिया है. चुनाव आयोग की ओर से बताए गए आंकड़ों के मुताबिक ये अब तक रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग प्रतिशत है. अभी इस आंकड़े में पोस्टल बैलेट और सर्विस वोटर्स के वोट शामिल नहीं हैं. इनकी सटीक संख्या 4 मई 2026 को मतों की गिनते के दिन ही स्पष्ट हो पाएगी. इलेक्शन कमीशन के मुताबिक अंतिम आंकड़ों में और बढ़ोतरी संभव है. इससे कुल मतदान प्रतिशत में थोड़ा और इजाफा हो सकता है. पहले चरण में कुल 16 जिलों की 152 सीटों पर वोटिंग हुई है. सबसे अधिक वोटिंग दक्षिण दिनाजपुर जिले में 94.4 प्रतिशत हुई है. कूचबिहार जिले में 94 प्रतिशत वोटिंग हुई है. बीरभूम में 93.2 प्रतिशत मतदान हुआ है. जलपाईगुड़ी में 92.7 प्रतिशत, मुर्शिदाबाद में भी 92.7 प्रतिशत वोटिंग हुई है. मतदान हुआ है. मुर्शिदाबाद में पश्चिम बंगाल की 22 विधानसभा सीटें आती हैं. और इस जिले में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं. यहां मुसलमानों की आबादी 65 प्रतिशत से ज्यादा है जबकि हिन्दुओं की आबादी सिर्फ 33 प्रतिशत है और अब तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की टीएमसी इस जिले में सबसे मजबूत थी.
आखिर किन वजहों से बंगाल में बढ़ा वोट प्रतिशत
पश्चिम बंगाल के लोग वैसे हर चुनाव में बढ़-चढ़कर मतदान करते हैं लेकिन इस चुनाव में सभी रिकॉर्ड टूट गए हैं. इस साल बंगाल में वोट प्रतिशत बढ़ने की क्या प्रमुख वजहें हैं आइए जानते हैं. वोट प्रतिशत बढ़ने की प्रमुख वजहों में सबसे ऊपर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) है. SIR से राज्य में 91 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए, जिससे कुल मतदाता संख्या घट गई है. मुर्शिदाबाद और मालदा में हर विधानसभा सीट पर औसत 50 हजार वोटर्स के नाम हटाए गए हैं ऐसे में मतदान प्रतिशत ज्यादा बढ़ा है. इसे आप ऐसे समझ सकते हैं. मान लीजिए कि पहले किसी विधानसभा क्षेत्र में तीन लाख मतदाता थे. पिछले विधानसभा चुनाव में 2 लाख 40 हजार लोगों ने अपने मत का इस्तेमाल किया था (यानी 80 परसेंट). इस बार एसआईआर नाम कटने के बाद मतदाताओं की संख्या घटकर 2 लाख 70 हजार हो गई है.
यदि 2 लाख 40 हजार लोग इस बार भी वोट देते हैं तो प्रतिशत 88 प्रतिशत हो जाएगा. यानी उतने ही लोगों के वोट देने के बावजूद मतदान प्रतिशत 8 प्रतिशत बढ़ रहा है. इसके अलावा वोटरों में मतदान नहीं करने पर मतदाता सूची से नाम कटने का डर था. ऐसे में लोगों ने इस बार बढ़-चढ़कर वोट दिया. SIR के चलते माइग्रेट वोटर्स ने बड़ी संख्या में मतदान करने के लिए दूसरे राज्यों से आए हैं. इस बार वोट बढ़ने की दूसरी वजह एंटी इनकंबेंसी भी हो सकती है. राज्य में 15 साल से ममता बनर्जी की सरकार है. नेताओं से असंतोष, रोजगार, भ्रष्टाचार, सिंडिकेट जैसे मुद्दे भी ज्यादा मतदान की वजह हो सकते हैं. इस बार बीजेपी का ध्रुवीकरण भी जबरदस्त रहा है. ऐसे में हिंदू मतदाताओं का भी वोट प्रतिशत ज्यादा रहा होगा. इसके अलावा वोट प्रतिशत बढ़ने की वजहों में चुनाव आयोग की सख्ती का रोल भी रहा है. निर्वाचन आयोग की अभूतपूर्व निगरानी और 2.40 लाख केंद्रीय बलों की तैनाती के कारण मतदाताओं ने बिना किसी डर के मतदान किया. इस चुनाव में महिलाओं ने भी खूब मतदान किया है. बीजेपी ने महिलाओं को लुभाने के लिए जहां कई वादे किए हैं तो वहीं टीएमसी सरकार पहले से ही महिलाओं के लिए लक्ष्मी भंडार योजना चला रही है.
रिकॉर्ड वोटिंग के क्या मायने
आपको मालूम हो कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में 82.30 फीसदी मतदान हुआ था. इस बार के चुनाव में बंगाल के लोगों ने मतदान के मामले में रिकॉर्ड बनाया है. पश्चिम बंगाल में पहले चरण में रिकॉर्ड वोटिंग के बाद अब सवाल उठ रहा है कि इसका क्या मायने हैं क्या बीजेपी को बहुमत मिलेगी या फिर मामता बनर्जी की पार्टी टीएमसी सरकार बना लेगी. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक ज्यादा वोटिंग का मतलब हमेशा एक जैसा नहीं होता. पश्चिम बंगाल का चुनाव ही नहीं बल्कि कई अन्य राज्यों में हुआ चुनाव और लोकसभा चुनाव का इतिहास साक्षी है कि कभी रिकॉर्ड वोटिंग से सरकार गिरी है, तो कभी सत्तारूढ़ पार्टी की सीटों में इजाफा भी हुआ है. आपको मालूम हो कि आमतौर लोग मानते हैं कि अधिक मतदान का मतलब एंटी एनकंबैसी फैक्टर हावी है यानी सत्ता में मौजूदा पार्टी से नाराजगी वाले वोट ज्यादा पड़े हैं. कम वोटिंग का मतलब है कि मतदाता उदासीन है और वे जो चल रहा है वो चलते रहने देना चाहते हैं यानी जिस पार्टी की सरकार है, उसकी रहनी चाहिए. हालांकि हमेशा यह सही नहीं होता है. राजनीति के जानकारों का कहना है कि थोड़ा घटे या थोड़ा बढ़े मतदान प्रतिशत का सत्ता विरोधी या सत्ता के पक्ष में कोई कनेक्शन समझ में नहीं आता.
यदि वोटिंग प्रतिशत में 6-7 फीसदी का अंतर हो तब जरूर इसका मतलब निकाल सकते हैं. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के मुताबिक आमतौर पर जब मत प्रतिशत घटता और बढ़ता है तो लोग उसके निहितार्थ निकालते हैं, लेकिन इसे लेकर किसी प्रकार की सहमति नहीं बन पाई है. जब भी औसत आंकड़ों में 7 या इससे अधिक प्रतिशत का हेरफेर होता है तो नतीजे चौंकाने वाले आते हैं. औसत आंकड़ों में 7 प्रतिशत या उससे ज्यादा मतदान होने के दो मतलब होते हैं. पहला या तो जनता मौजूदा सरकार को पूरी ताकत के साथ वापस लाना चाहती है या मौजूदा सरकार को पूरी ताकत के साथ हटाना चाहती है. ऐसे वोटिंग पैटर्न में चुनाव फंसते नहीं हैं बल्कि ऐसे वोटिंग पैटर्न में चुनाव स्पष्ट और आर-पार के बन जाते हैं. आपको मालूम हो कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2011 में 84.72% मतदान हुआ था, जब ममता बनर्जी ने सीपीआई (एम) के 34 सालों के शासन को खत्म करते हुए शानदार जीत हासिल की थी. ममता बनर्जी के नेतृत्व में सरकार बनी. हालांकि इसके बाद 2016 और 2021 के दो विधानसभा चुनावों में मतदान का प्रतिशत करीब 82 प्रतिशत रहा. आपको मालूम हो कि पिछले कुछ विधानसभा चुनावों में जहां भी मतदान प्रतिशत पिछली बार से कम रहा या पिछली बार जितनी ही मतदान हुआ, वहां ज्यादातर राज्यों में मौजूदा सरकार को फायदा मिला.
मध्य प्रदेश में मतदान प्रतिशत 75 से 76 प्रतिशत हुआ और वहां बीजेपी की सरकार बरकार रही. उत्तर प्रदेश में 61 प्रतिशत मतदान जब 60 प्रतिशत रह गया, तब वहां भी बीजेपी वापसी करने में कामयाब हुई. गोवा में भी जब 4 प्रतिशत मतदान कम हुआ, तब वहां भी बीजेपी की सरकार ने वापसी की. हालांकि इसमें कुछ अपवाद भी है. जैसे राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और पंजाब जैसे राज्यों में एक-दो प्रतिशत कम मतदान होने पर भी सरकारें बदल गई या एक-दो प्रतिशत ज्यादा मतदान होने पर भी सरकारें बदल गईं. 2023 में राजस्थान और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों में पिछले चुनावों (2018) की तुलना में वोटिंग प्रतिशत में वृद्धि देखी गई, जिसके परिणामस्वरूप वहां सत्ता परिवर्तन हुआ. ऐसे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में पहले चरण के चुनाव में हुई रिकार्ड वोटिंग से बीजेपी या ममता बनर्जी में से किसको फायदा और किसको नुकसान होगा. 4 मई 2026 को चुनाव के नतीजे आने के बाद ही यह पता चल सकेगा कि पश्चिम बंगाल की सत्ता पर किसका राज होगा.