पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटों पर चुनाव दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल 2026 को होने हैं. 4 मई 2026 को नतीजे आएंगे. किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए 148 सीटों का बहुमत हासिल करना जरूरी है. इस चुनाव पर पूरे देश की नजरें हैं. जी हां, यहां जीत और हार का फैसला सिर्फ राज्य तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि देश की सियासत पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा.
इस बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) और ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) में मुख्य लड़ाई है तो लेफ्ट और कांग्रेस में वापसी की छटपटाहट है. आपको मालूम हो कि विधानसभा चुनाव 2021 में टीएमसी ने 213 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया था. उधर, भाजपा 77 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी. इस बार चुनाव किसी तरह से एकतरफा नहीं दिख रहा है. बीजेपी और टीएमसी दोनों पार्टियां आक्रामक तैयारी में हैं. इस साल विधानसभा 2021 जैसी स्थिति नहीं है. 5 सालों में बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका है. चुनाव से पहले यहां आप जान सकते हैं चारों पार्टियों की ताकत और चुनौतियां.
गुरुवार को 152 सीटों पर मतदान
बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के तहत 23 अप्रैल दिन गुरुवार को 16 जिलों की 152 सीटों पर मतदान होना है. इनमें पूर्व मेदिनीपुर की 16 विधानसभा सीटें, पश्चिम मेदिनीपुर की 15, उत्तर बंगाल के 8 जिले, दक्षिण बंगाल के 3 और जंगलमहल अंचल के 5 जिले शामिल हैं. मुर्शिदाबाद की 22 विधानसभा सीटें, कूचबिहार की 9 सीटें, जलपाईगुड़ी की 7, अलीपुरद्वार की 5, कलिंपोंग की 1, दार्जिलिंग की 5, उत्तर दिनाजपुर की 9, दक्षिण दिनाजपुर की छह, मालदा की 12, बीरभूम की 11, पश्चिम बर्द्धमान की 9, झाड़ग्राम की 4, पुरुलिया की 9 व बांकुड़ा की 12 सीटें शामिल हैं. पहले चरण में कुल 1478 उम्मीदवार मैदान में हैं.
TMC की ताकत और चुनौतियां
ममता बनर्जी की पार्टी को 15 साल के शासन के बाद भ्रष्टाचार के आरोपों और आरजी कर जैसे संवेदनशील मामलों के कारण उपजे जन-आक्रोश का इस विधानसभा चुनाव में सामना करना पड़ रहा है. शुभेंदु अधिकारी अब बंगाल में भाजपा के धाकड़ नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं. इस बार का चुनावी मुकाबला सीधे तौर पर दीदी बनाम दादा यानी ममता बनाम शुभेंदु में बदल गया है. ममता बनर्जी की मां-माटी-मानुष और जन कल्याणकारी योजनाओं के जवाब में भाजपा परिवर्तन के नारे के साथ बंगाल की सत्ता तक पहुंचने के लिए जोर लगा रही है.
युवा बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था की शिकायतें पार्टी के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं. ऐसे में इस बार चुनाव में टीएमसी के पास 2021 जैसी स्थिति नहीं रहने वाली है. हालांकि ममता की पार्टी टीएमसी को अपनी कल्याणकारी योजनाओं, ग्रामीण संगठन और बंगाली गौरव की राजनीति पर भरोसा है. दुर्गा पूजा से लेकर लोक कल्याणकारी स्कीमों तक ही नहीं टीएमसी का फोकस महिला और अल्पसंख्यक मतदाताओं पर भी है. ममता की छवि बंगाल के ग्रामीण इलाकों में काफी गहरी है. विपक्षी पार्टियों को इसका तोड़ निकालना होगा. टीएमसी का मजबूत बूथ स्तरीय संगठन और लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री और स्वास्थ्य साथी जैसी योजनाओं ने महिलाओं और गरीबों के बीच एक मजबूत वोट बैंक तैयार किया है. ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव उनकी 15 साल की सत्ता को बचाने की चुनौती है. ममता बनर्जी के लिए 2026 की जीत 2029 की राष्ट्रीय राजनीति का आधार बनेगी.
BJP की ताकत और चुनौतियां
बीजेपी हर हाल में इस बार टीएमसी की सत्ता विरोधी लहर को अपने पक्ष में करना चाह रही है. भाजपा ने पिछले पांच सालों में इस राज्य में अपनी सांगठनिक शक्ति काफी बढ़ाई है. शुभेंदु अधिकारी अब नेता प्रतिपक्ष के रूप में ज्यादा आक्रामक हैं. नंदीग्राम की जीत का मनोवैज्ञानिक लाभ उनके साथ है. विधानसभा चुनाव 2021 में भाजपा सिर्फ उत्तर बंगाल और जंगलमहल तक सीमित थी, लेकिन इस बार के चुनाव में वह दक्षिण बंगाल और शहरी इलाकों में भी टीएमसी को कड़ी टक्कर दे रही है. बीजेपी उत्तर और दक्षिण बंगाल के साथ सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ, सुरक्षा और हिंदू मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रही है. भाजपा का पूरा जोर राष्ट्रीय नेतृत्व की छवि, केंद्र की विकास योजनाओं और राज्य में भ्रष्टाचार के आरोपों को मुद्दा बनाकर वोटरों को अपनी ओर खींचने पर है.
अमित शाह जैसे नेता बड़े दावे कर रहे हैं, लेकिन टीएमसी की जमीनी ताकत को तोड़ना बीजेपी की सबसे बड़ी परीक्षा होगी. बीजेपी की कमजोरी की बात करें तो इस पार्टी के पास स्थानीय स्तर पर कद्दावर बंगाली चेहरे की कमी और टीएमसी द्वारा थोपा गया 'बाहरी'का टैग है. भाजपा की प्रदेश इकाई में जारी आंतरिक कलह भी बड़ी परेशानी है. उत्तर भारतीय मॉडल पर अत्यधिक निर्भरता बंगाल में बीजेपी की जीत की संभावनाओं को सीमित कर सकती है. कुछ राजनीति के जानकारों का कहना है कि एसआईआर पर भाजपा के अत्यधिक जोर देने से मतुआ समुदाय जैसे विभिन्न समूह इस चुनाव में बीजेपी से दूरी बना सकते हैं. आपको मालूम हो कि राष्ट्रीय स्तर पर कई करिश्माई नेताओं के बावजूद बीजेपी को बंगाल में टीएमसी से हार का सामना करना पड़ता है. विश्लेषकों के मुताबिक टीएमसी की भाजपा को बाहरी बताने की मुहिम कारगर रही है.
कांग्रेस की ताकत और चुनौतियां
कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव 2026 में वाम दलों से गठबंधन तोड़कर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. इस पार्टी ने पश्चिम बंगाल में अपनी प्रासंगिकता एक बार फिर बहाल करने के लिए यह निर्णय लिया है. कांग्रेस मालदा मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे अपने पारंपरिक गढ़ों से काफी उम्मीद है. इन क्षेत्रों में कांग्रेस को उम्मीद है कि वह अपने पुराने वोट बैंक को फिर से सक्रिय कर सकती है. इस बार चुनाव में कांग्रेस पार्टी के टिकट के लिए बड़ी संख्या में आवेदन आए हैं, जो इस पार्टी के लिए एक ताकत हो सकती है. कांग्रेस की कमजोरी यह है कि इस पार्टी के पास संसाधनों की कमी है. बंगाल के कई जिलों में कमजोर नेटवर्क कांग्रेस के सामने बड़ी कमजोरी है.
माकपा की ताकत और चुनौतियां
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी माकपा कभी पश्चिम बंगाल में लगातार 34 सालों तक सत्ता पर काबिज रही थी. 1977 से 2011 तक वाम मोर्चे ने राज्य पर शासन किया था. आज यह पार्टी हाशिये पर है. यह पार्टी इस विधानसभा चुनाव में अपनी खोई जमीन वापस पाने में जुटी हुई है. इस पार्टी को अपने स्वच्छ छवि वाले नेताओं और शिक्षक भर्ती घोटाला और आरजी कर मेडिकल कॉलेज से जुड़े मुद्दों पर किए गए आंदोलनों से उम्मीद है. हालांकि यह देखना होगा कि यह आक्रोश वोटों में तब्दील हो पाता है या नहीं. माकपा की कमजोरी यह है कि आंदोलनों और प्रदर्शनों के बावजूद इस पार्टी को 2021 के विधानसभा चुनावों और 2019 एवं 2024 के लोकसभा चुनावों में कोई खास लाभ नहीं हुआ. पिछले चुनावों में पार्टी का वोट प्रतिशत काफी कम हो गया है. घटता जनाधार और नेताओं का उम्रदराज होना वाम मोर्चा के लिए बड़ी बाधाएं हैं. संगठनात्मक ढांचा भी पहले जितना मजबूत नहीं रहा.