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West Bengal Assembly Elections 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने का कांग्रेस का निर्णय कितना कारगर होगा साबित, क्या ममता की पार्टी TMC को मिलेगा झटका?

कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में अकेले लड़ने का फैसला किया है. अब सवाल उठ रहे हैं कि कांग्रेस का यह निर्णय कितना कारगर साबित होगा, क्या कांग्रेस खुद को पुनर्जीवित कर पाएगी या कम से कम मुर्शिदाबाद और मालदा में परंपरागत सीटों पर कुछ कमाल कर पाएगी? क्या कांग्रेस ममता की पार्टी TMC को झटका देगी? आइए जानते हैं आखिर क्यों कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है?

Congress
अनुपम मिश्रा
  • कोलकाता,
  • 29 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:30 PM IST

कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में अकेले लड़ने का फैसला किया है. अब सवाल उठ रहे हैं कि कांग्रेस का यह निर्णय कितना कारगर साबित होगा, क्या कांग्रेस खुद को पुनर्जीवित कर पाएगी या कम से कम मुर्शिदाबाद और मालदा में परंपरागत सीटों पर कुछ कमाल कर पाएगी? यदि इसमें थोड़ी सी भी कामयाबी कांग्रेस को मिलती है तो इससे क्या ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) को बड़ा नुकसान होगा?

...तो पार्टी को फिर से किया जा सकता है पुनर्जीवित
दरअसल, सालों बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस अकेले दम पर चुनाव लड़ने जा रही है. कांग्रेस के इस फैसले के पीछे दो बड़ी वजह है. इनमें से एक है लेफ्ट फ्रंट के साथ मोहभंग होना. आपको मालूम हो कि पिछले कई सालों से कांग्रेस लेफ्ट फ्रंट के साथ गठजोड़ कर चुनाव लड़ रही थी, लेकिन इस गठजोड़ की वजह से कांग्रेस को नुकसान होता आया है. वहीं कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि 60 के दशक में विधान चंद्र राय के नेतृत्व वाली कांग्रेस का सपना अगर दिखाया जाए तो पार्टी को फिर से पुनर्जीवित किया जा सकता है. इन्हीं दो बड़ी वजह से कांग्रेस ने इस बार पश्चिम बंगाल की कुल 294 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है.

पिछले कई सालों में प्रदर्शन रहा है निराशाजनक
यदि पिछले कई सालों में कांग्रेस का पश्चिम बंगाल चुनाव में प्रदर्शन देखें तो वो काफी निराशाजनक रहा है. विधानसभा चुनाव 2016 में 44 सीटें जीतने के बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली. 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर भी गिरकर केवल 3% रह गया. पार्टी का मानना है कि बंगाल में लेफ्ट पार्टियों की बढ़ती अलोकप्रियता की वजह से ही कांग्रेस को उसके साथ गठजोड़ करना महंगा पड़ा. केवल यही नहीं इसका असर कांग्रेस के मालदा और मुर्शिदाबाद में परंपरागत वोट बैंक पर भी पड़ा. यहां तक कि कांग्रेस के सबसे भारी भरकम नेता अधीर रंजन चौधरी को भी पिछली बार हार का सामना करना पड़ा.

जगी उम्मीद की किरण
बहरहाल, पार्टी के इस निर्णय ने कांग्रेस नेतृत्व में थोड़ी उम्मीद की किरण जरूर पैदा की है. पिछले दिनों मालदा कांग्रेस की बड़ी नेता मौसम नूर ने भी TMC छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है. ऐसे में पार्टी इस बार अपनी परंपरागत मालदा और मुर्शिदाबाद पर ध्यान केंद्रित कर रही है. पार्टी के एक नेता का कहना है कि कांग्रेस बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं कर रही है लेकिन अगर मालदा और मुर्शिदाबाद में कुछ सीटें भी आ जाए तो पार्टी को बंगाल में फिर से नया जीवन मिलेगा. 

...तो टीएमसी को हो सकता है नुकसान 
अभी तक कांग्रेस ने 294 सीटों पर उम्मीदवार की तालिका नहीं घोषित की है लेकिन समझा जा रहा है कि मालदा में मौसम नूर और मुर्शिदाबाद में अधीर रंजन चौधरी को चुनाव लड़वाया जाएगा ताकि कांग्रेस को कुछ बढ़त हासिल हो सके. ऐसे में मालदा और मुर्शिदाबाद की दो से तीन सीटों पर जहां मुस्लिम वोटर की संख्या ज्यादा है, वहां पर अगर कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करती है तो नुकसान तृणमूल कांग्रेस को हो सकता है क्योंकि दोनों का ही आधार मुस्लिम वोट बैंक है.

हुमायूं कबीर और ओवैसी की भी नजर
दिलचस्प बात ये है कि कांग्रेस के अलावा इन मुस्लिम बहुल इलाकों में हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी की भी नजर है. ओवैसी की पार्टी और हुमायूं कबीर की पार्टी ने गठजोड़ कर लिया है और साझा चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया है. ऐसी हालत में मालदा और मुर्शिदाबाद की कुछ सीटों पर मुस्लिम वोट बैंक का समीकरण काफी महत्वपूर्ण होता जा रहा है.

 

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