उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िला प्रशासन ने एक अनोखी पहल की शुरुआत की है. जिसके तहत अनपढ़ ग्राम प्रधानों को पढ़ाने-लिखाने की तैयारी की जा रही है. इस तरह की शुरुआत करने वाला बांदा उत्तर प्रदेश का पहला ज़िला बन गया है.
इस अनोखी योजना को "साक्षर प्रधान गांव की शान" नाम दिया गया है. इसके अंतर्गत पूरे जिले के अनपढ़ ग्राम प्रधानों को खोजकर साक्षर बनाने की कोशिश की जा रही है. इस योजना में चयनित सभी 58 पुरुष और महिला ग्राम प्रधानों को पढ़ाया जाएगा.
यह दो महीने का कोर्स होगा और इसे पूरा करने के बाद सभी को डीएम की ओर से साक्षरता का प्रमाण पत्र भी दिया जाएगा.
60 दिनों का होगा साक्षरता कोर्स:
बांदा जिले के डीएम अनुराग पटेल ने इस प्रोग्राम की जानकारी देते हुए बताया, "लगभग 60 दिन में सभी निरक्षर ग्राम प्रधानों को साक्षर बनाने की जिम्मेदारी गांव के शिक्षकों और आंगनबाड़ी को दी गयी है. पूरे जिले में 58 ऐसे प्रधान हैं जो बिल्कुल निरक्षर हैं, जिनमे 53 महिलाएं और 5 पुरुष शामिल हैं.”
इस कोर्स में मुख्य आकर्षण अंगूठा लगाने की बजाय अपना सिग्नेचर करना सीखना माना जा रहा है. जिसे लेकर सभी में बहुत उत्साह है. गांव के सरकारी शिक्षकों से लेकर DM तक ने इस पहल की जिम्मेदारी ली है. खुद पढ़-लिख जाने के बाद ही ये ग्राम प्रधान औरों को पढ़ाने लिखाने का कार्य कर पाएंगे.
गांव में शिक्षित प्रधान होने से गांववालों को भी प्रेरणा मिलेगी और गांव का विकास कार्य ज्यादा अच्छे से आगे बढ़ेगा.
ग्राम प्रधानों से लेकर शिक्षकों तक सभी में है उत्साह:
इस अनोखी योजना की सभी ग्राम प्रधानों ने सराहना की है. सभी बहुत खुश हैं कि अब वे भी दूसरों की तरह पढ़-लिख सकेंगे. 60 वर्ष की महिला ग्राम प्रधान बिपतिया ने बताया, “अब हम घर के कामों की जिम्मेदारी के साथ पढ़ना लिखना सीखेंगे. अब लोग हमें 'अनपढ़' नही कहेंगे.”
सुबह गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने के बाद घर मे बच्चों के साथ भी वे पढ़ेंगे. सभी ग्राम प्रधानों में पढ़ने को लेकर उत्सुकता है, मुरौल की प्रधान फूलकली ने बताया कि माता-पिता के राज में साक्षर नहीं बने, अंगूठा छाप थे और अभी तक इतने अधिकारी आये. सभी ने मीटिंग की लेकिन किसी ने ऐसा नही किया. लेकिन इस बार डीएम उन्हें अनपढ़ से साक्षर बना रहे हैं. यह बहुत अच्छी बात है.
इस अनोखी योजना में ग्राम प्रधानों को पढ़ाने-लिखाने की जिम्मेदारीलेने वाले शिक्षकों में भी बड़ा उत्साह है. उनका कहना है कि उन्हें वे बच्चों से ज्यादा ध्यान देकर पढ़ाने-लिखाने का कार्य कराएंगे, जिससे वे शिक्षित बन सकें.
डीएम ने शुरू की पहल:
डीएम अनुराग पटेल ने बताया कि जिले में उनकी पोस्टिंग के बाद उन्होंने अलग-अलग महिला ग्राम प्रधानों से सरकारी योजनाओं का जायजा लिया था. पर वे उन्हें जानकारी देने में असमर्थ थी. सभी निरक्षर ग्राम प्रधान अपने पति या बच्चों की सहायता से काम कर रही थीं.
इसलिए डीएम ने सोचा कि सबसे पहले ग्राम प्रधानों को शिक्षित किया जाए. इस पहल को उन्होंने प्रदेश सरकार की मुख्य योजना मिशन शक्ति फेज 3 से जोड़ा है. इन प्रधानों को एक बैग दिया गया है जिसमे पढ़ने-लिखने की सामग्री है.
DM ने बताया कि वह इन ग्राम प्रधानों को खुद अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. और सभी से संकल्प कराया गया है जब तक सुलेख नही लिखेंगे और तय समय के पहले साक्षरता का लक्ष्य हासिल नहीं करेंगी, तब तक पढ़ाई जारी रखी जाएगी. यह बांदा जिले की अनोखी और अच्छी पहल है.
(सिद्धार्थ गुप्ता की खबर)