Nida Fazli Birthday: निदा फ़ाज़ली - उनके शेर ऐसे जैसे दिन भर की थकान के बाद मां की गोद मिल जाए

उर्दू और हिन्दी के अजीम शायर निदा फ़ाज़ली (Nida Fazli ) का आज (12 अक्‍टूबर को) जन्‍मदिन है. आज ही के दिन साल 1938 में दिल्ली में उनका जन्‍म हुआ था. निदा फाजली के शेर और गजल आज भी लोग गुनगुनाते हैं. उनका नाम हिंदुस्‍तान के शीर्ष शायरों में लिया जाता है.

शायर निदा फाजली का आज जन्‍मदिन है ( फाइल फोटो)
नाज़िया नाज़
  • नई दिल्ली,
  • 12 अक्टूबर 2021,
  • अपडेटेड 9:19 AM IST
  • शायरी के जरिए बगावत करने वाले शायर
  • बड़ी से बड़ी बात आसान भाषा में कहना निदा की पहचान 
  • औरतों की आजादी से लेकर मजहबों की कट्टरता पर भारी शेर 

जाने वालों से राब्ता रखना 
दोस्तों रस्में वफा रखना 

घर की तामीर चाहे जैसी हो 
इसमें रोने की कुछ जगह रखना

मस्जिदें हैं नमाजियों के लिए 
अपने घर में कहीं खुदा रखना 
 
इन खूबसूरत लाइनों को लिखने वाले मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली का जन्म एक मुस्लिम पर‍िवार में 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ, मिशनरी स्कूल में पढ़ाई लिखाई हुई और पर‍िवार हिंदू बहुल इलाके में रहा. विभाजन के समय फ़ाज़ली का सारा परिवार पाकिस्तान चला गया लेकिन फ़ाज़ली ने भारत में ही बसे रहने का फैसला किया.

निदा फ़ाज़ली ने सीधी ज़ुबान के ज़रिए लोगों तक अपने कलाम पहुंचाए. न सिर्फ़ ग़ज़लें, नज़्में हीं बल्कि दोहे भी लिखे. हिंदी-उर्दू काव्य प्रेमियों के बीच अति लोकप्रिय और सम्मानित निदा फ़ाज़ली समकालीन उर्दू साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे. उन्होंने बॉलीवुड को कभी न भूलने वाले ऐसे गाने और गज़लें दी जो आज भी लोग गुनगुनाया करते हैं.

यूं तो कभी फिल्मों में तो कभी किताबों में निदा से मुलाकात हमेशा होती रहती है और खास बात तो ये कि निदा अपनी शायरी में बड़ी से बड़ी बात बड़ी ही आसान भाषा में कह जाते हैं. जिसे समझने के लिए भारी भरकम उर्दू का आना जरूरी नहीं. निदा भले ही बड़ी से बड़ी बात आसान भाषा में कह जाते थे लेकिन ईश्वर को ढूंढने का जो नजरिया उन्होंने समाज के सामने पेश किया, उससे कठमुल्ले नाराज हो गए थे. अब इसी शायरी को ले लीजिए.

घर से मस्जिद है बहुत दूर तो चलो यूं कर लें 
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए 

बड़ी से बड़ी बात आसान भाषा में कहना निदा की पहचान 
निदा जब पाकिस्तान गए तो वहां के लोगों ने ऊपर लिखी शायरी पर उन्हें घेर लिया, कहने लगे - बच्चा अल्लाह से बड़ा कैसे हुआ. इस पर निदा ने जवाब भी दिया था कि मस्जिद को इंसान बनाता है जबकी बच्चों को अल्लाह बनाता है. निदा बड़े-बड़े शब्दों का जाल नहीं बुनते थे.आसान भाषा में बातें कह देना निदा की पहचान थी. 

औरतों की आजादी से लेकर मजहबों की कट्टरता पर भारी शेर 
निदा फ़ाज़ली का असली नाम मुक्तदा हसन था. मुक्तदा मतलब रहबर, निदा यानी आवाज. यकीनन ही उनके असली नाम और पेट नाम का असर भी उन पर खूब था. उनके बेशुमार शेर गवाह हैं कि उन्होनें इंसानी जिंदगी के हर एहसास को ना सिर्फ आवाज़ दी बल्क‍ि उन सच्चाई को एक सांचे में भी ढाला. निदा की ये शायरी तो कत्ल ही कर डालती है, जब चन्द लाइनों में एक मजबूर औरत के दर्द, राजनीति की नीचता पर तंज के साथ ही मजहबों के दबे कुचले नजरिए पर निदा लानत भेजते हैं.  

वो तवाइफ 
कई मर्दों को पहचानती है
शायद इसलिए 
दुनिया को जियादा जानती है 
उसी कमरे में 
हर मजहब के भगवान की एक-एक तस्वीर लटकी है 
ये तस्वीरें 
लीडरों की तकरीरों की तरह नुमाशी नहीं 
उसका दरवाजा रात गए तक 
हिंदू 
मुस्लिम 
सिख 
ईसाई 
हर मजहब के आदमी के लिए खुला रहता है
खुदा जाने 
उस कमरे की सी कुशादगी (महारत)
मस्जिद और मंदिर के आंगनों में कब पैदा होगी. 

शायरी के जरिए बगावत करने वाले शायर 
निदा फाजली की शायरी में हमेशा एक तरह की बगावत देखने को मिलती रही. इस्लाम के नाम पर आंतक की खेती चलाने वाले लोगों को और चुप रह कर उस आंतक की तरफदारी करने वाले लोगों को निदा ने अपने ही अंदाज में चेताया तो चारों तरफ हड़कंप मच गया. 

उठ उठ के मस्जिदों से नामाजी चले गए
दहशतेगर्दों के हाथ में इस्लाम रह गया

उनके इस शेर ने चारों तरफ हंगामा बरपा दिया था. आलम ये कि निदा को महफिल छोड़ कर वापिस अपने घर जाना पड़ गया. लोगों ने उन पर इल्जाम लगाए कि वो इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं. नासमझ लोगों को इस बात का इल्म कहां था कि निदा ने तो सिर्फ इस बात पर तनकीद की थी कि इस्लाम का चेहरा गलत किस्म के लोग बनते जा रहे हैं, और इसे रोके जाने की जरूरत है. 

दोहों में निदा ने दी कबीर के दरवाजे को दस्तक
निदा साहब  की फिल्मी गीतों में भी अलग पहचान रही. कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता को कोई नहीं भूल सकता है. इसके अलावा निदा के तमाम गीत हैं, जो उनकी आला गीतकारी के सबूत हैं. दोहे लिखना उनकी नायाब सलाहियत का ही नमूना रहा. उनके कई दोहों को तो बकायदा कबीर के दोहे ही समझ लिया गया. निदा के दोहे पढ़ना मतलब इबादत करना. जैसे -

सबकी पूजा एक सी, अलग अलग है रीत
मस्जीद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत

सपना झरना नींद का, जागी आंखे प्यास 
पाना, खोना, खोजना सांसों का इतिहास 

निदा साहब के बारे में लिखने बैठे तो शब्द कम पड़ जाए. कोई एक आर्टिकल उनके लेखन को और उनकी शख्सियत को बयान करने के लिए काफी हो ही नहीं सकता. सैकड़ों अच्छे शेर में से एक अशआर आज उनकी पैदाइश के दिन आप याद कर सकते हैं. 

"इतना सच बोल कि होठों पर तबस्सुम न बुझे
रोशनी खत्म न कर आगे अंधेरा होगा"

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