Gaya: 'एलपीजी गैस क्राइसिस से कोई लेना देना नहीं..', देश का ये गांव है बिलकुल बेफिक्र.. गोबर गैस से चल रहा काम

जहां देश में एलपीजी गैस सिलेंडर को लेकर मुश्किल हालात पैदा हो रहे हैं. वहीं देश का एक गांव ऐसा भी है जिसे इससे कोई फर्क पड़ता ही नहीं है.

Women Using Gobar Gas
gnttv.com
  • गया,
  • 12 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 10:19 AM IST

ईरान , इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध का असर भारत पर भी दिखाई देने लगा है. भारत के कई राज्यों में एलपीजी गैस की क्राइसिस देखी जा रही है. एलपीजी गैस सिलेंडर भरवाने के लिए कई जगहों पर लोगों की लम्बी कतार लगी हुई है, तो कई बड़े शहरों में एलपीजी गैस की क्राइसिस के कारण बड़े होटल और रेस्तरां बंद होने की कगार पर आ गए हैं. लेकिन इस एलपीजी गैस क्राइसिस के बीच गया जिला के बोधगया प्रखंड के बतसपुर गांव एक अलग ही मिसाल पेश कर रहा है. इस गांव के लोग 'लोहिया स्वच्छ अभियान' के तहत गांव में ही गोबर गैस प्लांट का फायदा उठा रहे हैं. यहां गोबर गैस प्लांट से पाइप लाइन के द्वारा गांव के घरों की रसोई में गोबर गैस पहुंचाई जाती है. 

महिलाएं इस गोबर गैस से अपने परिवार का रोजाना खाना बनाती हैं और खास बात यह है की गांव के सभी घरों के बाहर गोबर गैस का मीटर लगाया गया है, जिससे यह पता चलता है की कौन से घर में कितनी गैस उपयोग हो रही है. जिसके बाद गांव के लोगों को उसी हिसाब से गैस के बदले में गोबर लिया जाता है और उन्हें गैस निःशुल्क दी जाती है. जो लोग ग्रामीण गोबर गैस के बदले में गोबर नहीं दे पाते है उनसे 25 रुपया यूनिट के हिसाब से पैसे लिए जाते हैं. 

गोबर के बदले मिलती है गैस
गांव की एक महिला ने बताया की फिलहाल इस गांव के 40 घरों में इस प्लांट से गैस पहुंच रही है. जिससे गोबर गैस से गांव वालों को बहुत फायदा हो रहा है. इसके अलावा जहां पहले गांव में दरवाजों पर गोबर रखा हुआ करता था, वो स्थिति अब बदल गई है. अब उसी गोबर से गैस बनाई जाती है. जिससे लोग अपने घरों में खाना बनाते है. साथ ही गोबर को खाद के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं. ऐसा करने से गांव भी साफ रहता है. जो लोग गोबर नहीं दे पाते हैं उसने 25 रुपए यूनिट के हिसाब से पैसे लिए जाते हैं और यह गोबर गैस प्लांट इस गांव में तीन वर्षो से चल रहा है और यह चौथा वर्ष है. प्लांट का फायदा इस समय गैस सिलेंडर क्राइसिस के समय काफी देखने को मिल रहा है.

'एलपीजी क्राइसिस से हमें कोई मतलब नहीं'
गांव की एक और महिला ने कहा कि एलपीजी क्राइसिस से हम लोगों को कोई मतलब नहीं है. हमारे गांव में प्रधानमंत्री योजना के तहत गोबरधन चल रहा है. गोबर गैस प्लांट और इसका लाभ हम सभी गांव वाले ले रहे हैं. हम लोग सिर्फ गाय का गोबर प्लांट वालों को देते है और उसके एवज में हम लोगों को गैस मिलती है. इसी गैस पर हम लोग परिवार का खाना बनाते है. इस गैस से खाना बनाने में भी फयदा है. जिस तरह से हम लोग पहले लकड़ी पर खाना बनाते थे, तो जो स्वाद आता था वही स्वाद इस गोबर गैस पर खाना बनाने में आता है. इस गैस की आग भी बहुत तेज होती है. मात्र 30 मिनट में घर का खाना बन जाता है. हम लोग खेती भी करते है, तो गोबर गैस प्लांट से जो जैविक खाद निकालती है उसको भी हम लोग अपने खेतों में खाद की तरह इस्तेमाल करते हैं.

क्या बोले गांव के मुखिया?
गांव के मुखिया ईश्वर मांझी ने बताया की हम सभी ग्रामीणों ने मिलकर गांव में गोबर गैस प्लांट लगाया है. जो बहुत ही अच्छे से चल रहा है. पिछले 4 वर्षो से गांव के लगभग 50 घरों में गोबर गैस प्लांट से पाइप लाइन के द्वारा गैस जा रही है. गांव की महिलाए इसी गैस पर खाना बनाती हैं. पहले वो लकड़ी पर बनाती थीं, तो धुआं परेशान करता था, पर अब ऐसा नहीं होता.

- पंकज कुमार की रिपोर्ट

 

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