पिता बैरिया बस स्टैंड पर चाय-नाश्ते की छोटी सी दुकान चलाते हैं और मां गृहिणी हैं. घर की आर्थिक स्थिति सामान्य थी, लेकिन बेटे ने सपने बड़े, जिन्हें उसने देखना कभी नहीं छोड़ा. मुजफ्फरपुर के बैरिया निवासी घनश्याम जायसवाल ने अपनी मेहनत और लगातार प्रयास के दम पर UPSC परीक्षा में सफलता हासिल कर असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर चयनित होकर परिवार का नाम रोशन किया है.
घनश्याम ने 12वीं की पढ़ाई के दौरान IIT-JEE की परीक्षा दी थी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. असफलता से निराश होने के बजाय उन्होंने अपने लिए बड़ा लक्ष्य तय किया और UPSC की तैयारी शुरू कर दी. वह पिछले करीब 5-6 वर्षों से वह लगातार प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटे रहे.
घनश्याम की शुरुआती पढ़ाई बैरिया स्थित नथुनी भगत विद्यालय से हुई. इसके बाद उन्होंने रामेश्वर सिंह कॉलेज, मुजफ्फरपुर से साइंस विषय में 12वीं की पढ़ाई पूरी की. आगे राजनीति विज्ञान से ऑनर्स में स्नातक किया.
तैयारी के दौरान उन्होंने पढ़ाई के साथ परिवार की जिम्मेदारियों को भी समझा. जरूरत पड़ने पर पिता की चाय-नाश्ते की दुकान पर हाथ बंटाते थे. इसके बावजूद उनकी पढ़ाई का सिलसिला नहीं टूटा.
घनश्याम बताते हैं कि पिछले 5-6 वर्षों में उन्होंने औसतन रोजाना 9 से 10 घंटे पढ़ाई की. रात में करीब 12 से 1 बजे तक पढ़ाई करने के बाद सुबह उठते थे. इसके बाद कुछ बच्चों को पढ़ाने के साथ अपनी तैयारी में फिर जुट जाते थे. उनके मुताबिक UPSC की तैयारी में सबसे अहम चीज निरंतरता है. लंबे समय तक लगातार तैयारी करते रहना ही उनकी सफलता की सबसे बड़ी रणनीति रही.
घनश्याम ने UPSC की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को सलाह दी कि सबसे पहले बेसिक्स मजबूत करें. इसके लिए NCERT की किताबों को खुद पढ़ना और अपने हाथ से नोट्स तैयार करना बेहद जरूरी है. उनका कहना है कि खुद बनाए गए नोट्स से विषय को समझने में आसानी होती है और परीक्षा के समय रिवीजन भी बेहतर तरीके से किया जा सकता है.
घनश्याम के पिता शत्रुधन शाह का कहना है कि परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन उन्होंने बेटे की पढ़ाई को कभी रुकने नहीं दिया. दुकान से होने वाली आमदनी के बीच परिवार की जरूरतें पूरी करते हुए बेटे की पढ़ाई जारी रखी.
UPSC में सफलता हासिल करने के बाद भी घनश्याम ने अपनी तैयारी नहीं छोड़ी है. उनका लक्ष्य अगले साल फिर UPSC परीक्षा में शामिल होकर इससे बेहतर रैंक हासिल करना और भविष्य में बड़ी जिम्मेदारी संभालना है.
घनश्याम की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं. उन्होंने साबित किया है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत लगातार जारी रहे तो सफलता हासिल की जा सकती है.