स्वाभाविक रूप से पैदा हुए शिशुओं में वैक्सीन दी जाने के बाद ज्यादा एंटीबॉडी लेवल पाई गईं बजाय उनके जो शिशु सिजेरियन सेक्शन से पैदा हुए है. दरअसल, इसको लेकर हाल ही में रिसर्च हुई है जिसमें ये सामने आया है. बता दें, ये वैक्सीन बच्चों को फेफड़ों में इंफेक्शन और मेनिन्जाइटिस का कारण बनने वाले बैक्टीरिया से बचाती है. इस रिसर्च को लेकर एक्सपर्ट का कहना है कि इससे गर्भवती माताओं और उनके डॉक्टरों के बीच सी-सेक्शन के बारे में बातचीत और उनके वैक्सीनेशन प्रोग्राम का डिजाइन करने में मदद मिल सकती है.
120 बच्चों को किया गया शामिल
शोधकर्ताओं ने इसके लिए 120 शिशुओं के एक समूह में वैक्सीन के बाद पेट के रोगाणुओं और एंटीबॉडी के लेवल के बीच संबंधों का अध्ययन किया. इन सभी शिशुओं को लंग इन्फेक्शन और मेनिन्जाइटिस के खिलाफ 8 और 12 सप्ताह में टीका लगाया गया था. इस दौरान शोधकर्ताओं ने गट माइक्रोबायोम के विकास को ट्रैक किया. ये रोगाणुओं (Microbes) का ग्रुप होता है जो हमारे शरीर में रहता है. ये बच्चे के जीवन के पहले वर्ष में और 12 और 18 महीनों में लार के सैंपल का टेस्ट करके वैक्सीन प्रति उनका इम्यून रिस्पांस देखा जाता है.
क्या आया रिसर्च में?
बताते चलें कि ये रिसर्च एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी, यूट्रेक्ट में स्पार्ने अस्पताल और यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर और नीदरलैंड में राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान और पर्यावरण से एक टीम द्वारा किया गया था. फेफड़ों के संक्रमण से बचाने वाली वैक्सीन को जब लगाया गया तब पाया कि 101 शिशुओं में जिनको नेचुरल रूप में डिलीवर किया गया था उनमें सी-सेक्शन से हुए शिशुओं की तुलना ज्यादा एंटीबॉडी पाई गईं.
बताते चलें कि मेनिन्जाइटिस से बचाने वाले टीके के परिणामस्वरूप एंटीबॉडी के लेवल का टेस्ट 66 शिशुओं में किया गया. बताते चलें कि गट माइक्रोबायोम जन्म के समय पैदा होता है, और शिशु के पैदा होने के पहले कुछ महीनों में तेजी से विकसित होता है, और ज्यादातर डिलीवरी मोड, स्तनपान और एंटीबायोटिक उपयोग से प्रभावित होता है.