सुबह की जल्दी में जब हम ब्रेड टोस्ट करके खाते हैं, तो शायद ही कभी सोचते हैं कि वही टोस्ट हमारे लिए नुकसानदेह भी हो सकता है. खासकर बच्चे टिफिन में सैंडविच ले जाते हैं या घर में रोजाना ब्रेड खाई जाती है. ऐसे में यह खबर सीधे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी है. अब वैज्ञानिकों ने ऐसी गेहूं की किस्म विकसित की है जिससे बना ब्रेड टोस्ट करने पर कम नुकसानदायक होगा.
यह खोज ब्रिटेन के Rothamsted Research के वैज्ञानिकों ने की है और इसमें आधुनिक जीन एडिटिंग तकनीक CRISPR genome editing का इस्तेमाल किया गया है.
मौजूदा ब्रेड में आखिर समस्या क्या है?
हम रोज जो ब्रेड खाते हैं उसे जब टोस्ट या बेक किया जाता है तो उससे एक केमिकल निकलता है जिसे Acrylamide कहा जाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह एक कैंसर पैदा करने वाला केमिकल है. यह केमिकल गेहूं में मौजूद एक अमीनो एसिड 'फ्री एस्परैजिन' से बनता है, जो पौधे में नाइट्रोजन स्टोर करने का काम करता है.
कैसे किया गया समाधान?
वैज्ञानिकों ने CRISPR genome editing की मदद से गेहूं के उस जीन को टारगेट किया जो एस्परैजिन बनाता है. इससे गेहूं में इस अमीनो एसिड की मात्रा काफी कम हो गई.
ट्रायल में क्या-क्या मिला?
दो साल के फील्ड ट्रायल में एस्परैजिन की मात्रा 59% तक कम हो गई.कुछ मामलों में यह कमी 93% तक पहुंच गई. सबसे बड़ी बात फसल की पैदावार पर इसका कोई असर नहीं पड़ा. जब इस गेहूं से ब्रेड और बिस्किट बनाए गए, तो टोस्ट करने के बाद भी उनमें एक्रिलामाइड का स्तर बहुत कम, बल्कि कुछ मामलों में लगभग न के बराबर था.
पहले वैज्ञानिक केमिकल ट्रीटमेंट से गेहूं में बदलाव करते थे, जिससे रैंडम म्यूटेशन होते थे. इससे एस्परैजिन लगभग 50% ही कम हो पाता था और फसल की पैदावार करीब 25% तक घट जाती थी. नई तकनीक ज्यादा सटीक है और नुकसान भी नहीं करती. ब्रिटेन में 2023 का Genetic Technology (Precision Breeding) Act 2023 इस तरह की फसलों के विकास को बढ़ावा देता है.
आम लोगों के लिए क्या मायने?
मतलब साफ है भविष्य में हम जो ब्रेड खाएंगे, वह ज्यादा सुरक्षित हो सकता है. खासतौर पर उन लोगों के लिए जो रोजाना टोस्ट या बेक्ड चीजें खाते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक न सिर्फ स्वास्थ्य के लिए बेहतर है, बल्कि किसानों और फूड इंडस्ट्री के लिए भी फायदेमंद हो सकती है.
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