एक ही वैक्सीन से कोल्ड, फ्लू और कोविड का होगा इलाज, वैज्ञानिक तैयार कर रहे यूनिवर्सल रेस्पिरेटरी वैक्सीन

अब तक ज्यादातर वैक्सीन किसी एक खास वायरस या बैक्टीरिया को पहचानना सिखाती हैं. लेकिन यह नई वैक्सीन अलग तरीके से काम करती है. इसमें ऐसे मॉलिक्यूल्स डाले गए हैं, जो शरीर में तब बनने वाले संकेतों की नकल करते हैं.

Nasal Vaccine
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 26 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:29 AM IST
  • सर्दी-जुकाम, फ्लू और कोविड से एक साथ बचाव?
  • इम्यून सिस्टम को हाई अलर्ट पर रखेगी नई रेस्पिरेटरी वैक्सीन

कोल्ड, फ्लू और कोविड जैसी सांस से जुड़ी बीमारियों से बचाव के लिए हर साल अलग-अलग वैक्सीन लगवानी पड़ती है. लेकिन अब वैज्ञानिकों ने ऐसी यूनिवर्सल रेस्पिरेटरी वैक्सीन बनाई है, जो एक साथ कई वायरस से सुरक्षा दे सकती है.

जर्नल Science में प्रकाशित एक नई स्टडी में चूहों पर इसके नतीजे उम्मीद जगाने वाले मिले हैं. हालांकि यह रिसर्च अभी शुरुआती चरण में है और इंसानों पर ट्रायल बाकी हैं. चलिए इस वैक्सीन के बारे में विस्तार से जानते हैं.

यह नई वैक्सीन क्या है और कैसे काम करती है?
अब तक ज्यादातर वैक्सीन किसी एक खास वायरस या बैक्टीरिया को पहचानना सिखाती हैं. लेकिन यह नई वैक्सीन अलग तरीके से काम करती है. इसमें ऐसे मॉलिक्यूल्स डाले गए हैं, जो शरीर में तब बनने वाले संकेतों की नकल करते हैं, जब कोई वायरस या बैक्टीरिया हमला करता है. इससे इम्यून सिस्टम के कुछ हिस्से लंबे समय तक हाई अलर्ट पर आ जाते हैं.

यानी यह किसी एक वायरस को नहीं, बल्कि शरीर की सामान्य सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करती है, ताकि वह अलग-अलग खतरों से तेजी से निपट सके.

इंजेक्शन नहीं, नाक से स्प्रे क्यों?
यह वैक्सीन इंजेक्शन की बजाय नेजल स्प्रे के रूप में दी जाएगी. नाक, गला और फेफड़े शरीर के ऐसे हिस्से हैं, जहां से वायरस सबसे पहले प्रवेश करते हैं. इन जगहों की भीतरी परत को म्यूकोसल सरफेस कहते हैं. अगर वैक्सीन सीधे यहीं दी जाए, तो इम्यून प्रतिक्रिया ज्यादा मजबूत होती है.

यूके में बच्चों को दी जाने वाली फ्लू वैक्सीन भी नेजल स्प्रे के रूप में दी जाती है. रिसर्च में यह भी पाया गया है कि कोविड वैक्सीन को नाक के जरिए देने पर जानवरों में संक्रमण रोकने की क्षमता ज्यादा दिखी.

एक वैक्सीन कई बीमारियों से कैसे बचाएगी?
यह वैक्सीन दो अहम इम्यून कोशिकाओं के बीच तालमेल बढ़ाती है. पहली हैं एल्वियोलर मैक्रोफेज. ये फेफड़ों की छोटी वायु थैलियों में मौजूद बड़ी कोशिकाएं होती हैं. इनका काम सांस के साथ आने वाले हानिकारक कणों और जीवाणुओं को नष्ट करना है. 

दूसरी हैं टी-सेल्स, जो एंटीवायरल प्रतिक्रिया को तेज करती हैं. क्योंकि यह वैक्सीन किसी एक वायरस को निशाना नहीं बनाती, बल्कि शरीर की शुरुआती सुरक्षा को मजबूत करती है, इसलिए यह कई अलग-अलग वायरस के खिलाफ काम कर सकती है.

क्या इससे साल में कई इंजेक्शन की जरूरत खत्म हो जाएगी?
अगर यह इंसानों में सफल रहती है, तो संभव है कि फ्लू, कोविड और सामान्य सर्दी जैसे RNA वायरस के खिलाफ अलग-अलग वैक्सीन की जरूरत कम हो जाए. हालांकि, चिकनपॉक्स या हेपेटाइटिस जैसे DNA वायरस पर इसका असर होगा या नहीं, यह अभी साफ नहीं है.

सुरक्षा कितने समय तक रहेगी?
चूहों में यह सुरक्षा लगभग तीन महीने तक रही. यह पारंपरिक वैक्सीन की तुलना में कम अवधि है. अगर इंसानों में भी यही स्थिति रही, तो इसे हर साल शरद ऋतु में दिया जा सकता है, ताकि सर्दियों के पीक सीजन में सुरक्षा मिल सके.

यह आम लोगों तक कब पहुंचेगी?
स्टडी के सीनियर लेखक बाली पुलेंद्रन के मुताबिक, अगर सब कुछ सही रहा तो 5 से 7 साल में ऐसी वैक्सीन उपलब्ध हो सकती है. हालांकि, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि शुरुआती मानव ट्रायल कितने सफल रहते हैं.

 

Read more!

RECOMMENDED