Expert Talk: सेंसेरिन्यूरल हियरिंग लॉस क्या है? क्या ईयरबड या तेज आवाज से यह बीमारी हो सकती है? शुरुआती लक्षण, बचाव कैसे करें?

प्लेबैक सिंगर अलका याग्निक ने हाल ही में खुलासा किया है कि वह Sensorineural Hearing Loss (SNHL) नाम की गंभीर सुनने की बीमारी से जूझ रही हैं। इस बीमारी के कारण उनकी सुनने की क्षमता प्रभावित हुई है.

hearing loss
अपूर्वा राय
  • नई दिल्ली ,
  • 25 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:30 PM IST
  • क्या ईयरबड या तेज आवाज से यह बीमारी हो सकती है?
  • बचाव कैसे करें?

प्लेबैक सिंगर अलका याग्निक हाल ही में राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में पद्म भूषण सम्मान लेने पहुंचीं. इस दौरान वह लंबे समय बाद सार्वजनिक रूप से नजर आईं. समारोह के बाद अलका ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट साझा करते हुए बताया कि वह Sensorineural Hearing Loss (SNHL) यानी सुनने की क्षमता से जुड़ी गंभीर समस्या से जूझ रही हैं. उन्होंने कहा कि इसी वजह से वह लंबे समय तक मीडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहीं.

अलका ने अपने पोस्ट में लिखा कि अब वह धीरे-धीरे सामान्य जीवन में लौटने और फिर से काम शुरू करने की कोशिश कर रही हैं. उन्होंने अपने फैंस और शुभचिंतकों का धन्यवाद भी किया और कहा कि लोगों के प्यार और समर्थन ने उन्हें इस मुश्किल दौर में हिम्मत दी.

अलका ने जिस बीमारी का जिक्र किया वह असल में क्या है और किस तरह से लोग इससे प्रभावित होते हैं ये जानने के लिए GNT ने बात की मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, वैशाली के ENT डायरेक्टर डॉ. राहुल अग्रवाल से.

आखिर क्या है Sensorineural Hearing Loss?
Sensorineural Hearing Loss यानी SNHL सुनने की क्षमता से जुड़ी एक ऐसी समस्या है, जिसमें कान के अंदर मौजूद बेहद संवेदनशील हिस्से या सुनने वाली नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं. कान के अंदर छोटे-छोटे हेयर सेल्स होते हैं जो आवाज को इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदलकर दिमाग तक पहुंचाते हैं. जब ये सेल्स खराब हो जाते हैं तो आवाज सही तरीके से दिमाग तक नहीं पहुंच पाती. डॉक्टर के मुताबिक एक बार ये हेयर सेल्स खराब हो जाएं तो दोबारा नहीं बनते. यही कारण है कि इस प्रकार की सुनने की समस्या अक्सर स्थायी हो सकती है. पहले यह बीमारी ज्यादातर बढ़ती उम्र के लोगों में देखी जाती थी, लेकिन अब युवाओं में भी इसके मामले तेजी से सामने आ रहे हैं.

इसे अचानक बहरापन भी कहा जाता है?
सामान्य भाषा में SNHL को अचानक होने वाला बहरापन भी कहा जाता है. कई मामलों में व्यक्ति की सुनने की क्षमता अचानक कम हो जाती है, जबकि कई बार यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ती है. अधिकतर मामलों में एक कान प्रभावित होता है, लेकिन कुछ लोगों में दोनों कानों की सुनने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है. समस्या यह है कि शुरुआत में लोग इसे सामान्य सुनने की दिक्कत समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. इसी कारण बीमारी समय रहते पकड़ में नहीं आती और नुकसान बढ़ जाता है.

कैसे पहचानें इसके शुरुआती लक्षण?
डॉक्टर के अनुसार Sensorineural Hearing Loss के लक्षण धीरे-धीरे दिखाई देते हैं. सबसे आम संकेत यह है कि व्यक्ति को बातचीत समझने में परेशानी होने लगती है. खासकर भीड़भाड़ या शोर वाले माहौल में सामने वाले की बात साफ सुनाई नहीं देती. ऐसे लोग अक्सर दूसरों से बात दोहराने के लिए कहते हैं. उन्हें लगता है कि लोग स्पष्ट बोल नहीं रहे या बड़बड़ा रहे हैं. कई मरीजों को कानों में लगातार घंटी, भनभनाहट या सीटी जैसी आवाज सुनाई देती है, जिसे टिनिटस (Tinnitus) कहा जाता है. इसके अलावा फोन पर बात करने में दिक्कत होना, बच्चों या महिलाओं जैसी ऊंची आवाजें कम सुनाई देना और टीवी की आवाज बार-बार बढ़ाना भी इसके संकेत हो सकते हैं.

डेसीबल से नापी जाती है आवाज की तीव्रता
आवाज की तीव्रता को डेसीबल (dB) में मापा जाता है. सामान्य शांति का स्तर करीब 0 डेसीबल माना जाता है. फुसफुसाहट लगभग 30 डेसीबल और सामान्य बातचीत करीब 60 डेसीबल की होती है. डॉक्टर से मुताबिक यदि किसी व्यक्ति को लगातार तीन फ्रीक्वेंसी पर 30 डेसीबल कम सुनाई देता है तो इसे Sensorineural Hearing Loss माना जाता है. आसान भाषा में समझें तो 60 डेसीबल की सामान्य बातचीत भी उसे लगभग 30 डेसीबल जैसी सुनाई दे सकती है. यानी सामने वाला सामान्य आवाज में बात कर रहा हो, फिर भी उसे ऐसा लगेगा जैसे कोई बहुत धीमे बोल रहा है.

क्या हेडफोन और ईयरफोन बन सकते हैं वजह?
आजकल युवाओं में लगातार ईयरफोन और हेडफोन के इस्तेमाल की आदत बढ़ रही है. डॉक्टर का कहना है कि लंबे समय तक तेज आवाज में गाने सुनना SNHL का बड़ा कारण बन सकता है. दरअसल, तेज आवाज कान के अंदर मौजूद नाजुक हेयर सेल्स को नुकसान पहुंचाती है. अगर यह नुकसान लगातार होता रहे तो सुनने की क्षमता स्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है. इसलिए डॉक्टर 60/60 नियम अपनाने की सलाह देते हैं. यानी हेडफोन का वॉल्यूम 60% से ज्यादा न रखें और लगातार 60 मिनट से ज्यादा इस्तेमाल न करें.

बचाव के लिए क्या करें?
यह नुकसान कई बार स्थायी हो सकता है, इसलिए बचाव सबसे जरूरी है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि तेज शोर वाले माहौल में ईयर प्रोटेक्शन का इस्तेमाल करें. ईयरफोन की आवाज सीमित रखें और बीच-बीच में ब्रेक लेते रहें.

कान में कॉटन बड्स या नुकीली चीजें डालने से भी बचना चाहिए. इसके अलावा डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों को नियंत्रित रखना जरूरी है, क्योंकि ये कान तक पहुंचने वाले रक्त प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं. जो लोग लगातार शोर वाले वातावरण में काम करते हैं, उन्हें नियमित रूप से हियरिंग टेस्ट करवाना चाहिए.

दुनिया के 20% लोग हैं प्रभावित
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार दुनिया की लगभग 20% आबादी किसी न किसी स्तर पर सुनने की समस्या का सामना कर रही है. इनमें बड़ी संख्या Sensorineural Hearing Loss से प्रभावित लोगों की है.

 

Read more!

RECOMMENDED