'हमारे लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं है...' दिल्ली की 49 वर्षीय संगीता (बदला हुआ नाम) अपने जुड़वा बच्चों को गोद में लेकर यही कहती हैं. बच्चे को गोद में लेने का जो सुकून है वो संगीता के चेहरे पर साफ दिखता है...
संगीता बताती हैं कि बढ़ती उम्र में दोबारा मां बनने का फैसला आसान नहीं था. लेकिन सालों तक निसंतान होने के ताने सुनने के बाद उन्होंने In Vitro Fertilization (IVF) की मदद ली.
कुछ ऐसी ही कहानी बिहार की रहने वाली प्रिया (नाम बदला हुआ) की भी है. शादी के बाद 12 साल तक उन्हें संतान सुख नहीं मिला. रिश्तेदारों के सवाल, समाज के ताने और हर त्योहार पर अधूरी लगने वाली खुशियां उनके जीवन का हिस्सा बन गई थीं. आखिरकार पति से लंबी बातचीत के बाद उन्होंने IVF कराने का फैसला किया और 2024 में जुड़वा बच्चों की मां बनीं.
संगीता और प्रिया की कहानियां अलग-अलग शहरों की जरूर हैं, लेकिन दर्द एक जैसा है. वर्षों तक इलाज, उम्मीद और निराशा से जूझने के बाद विज्ञान ने उन्हें वह खुशी दी, जिसकी उम्मीद उन्होंने छोड़ दी थी.
दरअसल, यह सिर्फ दो महिलाओं की कहानी नहीं है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, दुनिया में हर 6 में से 1 व्यक्ति, यानी करीब 17.5% लोग, अपने जीवनकाल में किसी न किसी समय इंफर्टिलिटी का सामना करते हैं. यही वजह है कि कभी टेस्ट ट्यूब बेबी कहकर हैरानी से देखी जाने वाली IVF तकनीक आज लाखों दंपतियों के लिए उम्मीद की नई राह बन चुकी है.
World IVF Day के मौके पर हमने सीनियर गायनेकोलॉजिस्ट और IVF स्पेशलिस्ट डॉ. निहिता पांडे से समझा कि IVF आखिर है क्या, किन लोगों को इसकी जरूरत पड़ती है, इलाज शुरू करने से पहले कौन-कौन सी जांच जरूरी होती हैं और इसे लेकर लोगों के मन में फैली सबसे बड़ी गलतफहमियां क्या हैं.
आसान शब्दों में IVF क्या है? किन लोगों को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है?
डॉ. निहिता बताती है, IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन एक ऐसी फर्टिलिटी तकनीक है, जिसमें महिला के अंडाणु (Egg) और पुरुष के शुक्राणु (Sperm) को शरीर के बाहर लैब में मिलाकर भ्रूण (Embryo) तैयार किया जाता है. इसके बाद इस भ्रूण को महिला के गर्भाशय (Uterus) में ट्रांसफर किया जाता है ताकि गर्भधारण हो सके. इसे आम भाषा में लोग टेस्ट ट्यूब बेबी कहते हैं, लेकिन वास्तव में इसमें कोई टेस्ट ट्यूब नहीं होती. केवल निषेचन (Fertilization) की प्रक्रिया शरीर के बाहर लैब में होती है.
IVF हर इंफर्टाइल कपल के लिए पहला इलाज नहीं है. जब सामान्य दवाओं या दूसरे इलाज से गर्भधारण की संभावना कम होती है या पहले के उपचार असफल हो चुके होते हैं, तब IVF की सलाह दी जाती है.
आमतौर पर इसकी जरूरत इन परिस्थितियों में पड़ती है-
फैलोपियन ट्यूब का ब्लॉक होना
पुरुषों में गंभीर स्पर्म संबंधी समस्या
महिला की बढ़ती उम्र
अंडाशय की क्षमता (Ovarian Reserve) कम होना
गंभीर एंडोमेट्रियोसिस
कुछ आनुवंशिक बीमारियां, जिनमें भ्रूण की जांच जरूरी हो
ऐसी इंफर्टिलिटी, जिसकी वजह स्पष्ट न हो और दूसरे इलाज सफल न हुए हों.
एक बड़ी गलतफहमी यह भी है कि IVF केवल महिलाओं का इलाज है. जबकि सच यह है कि करीब 40 से 50 प्रतिशत मामलों में पुरुष भी इंफर्टिलिटी के लिए जिम्मेदार होते हैं. इसलिए IVF हमेशा पति-पत्नी, दोनों का इलाज है.
क्या IVF से पहले पति और पत्नी, दोनों की जांच जरूरी होती है?
फर्टिलिटी दोनों की साझा जिम्मेदारी है, इसलिए जांच भी दोनों की साथ होनी चाहिए. महिला में हम अंडाशय की क्षमता, ओव्यूलेशन, गर्भाशय और फैलोपियन ट्यूब की स्थिति की जांच करते हैं. वहीं पुरुष के लिए सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती जांच सीमन एनालिसिस होती है, जिससे स्पर्म की संख्या, उनकी गति और गुणवत्ता का पता चलता है. यदि केवल एक व्यक्ति की जांच कराई जाए तो बीमारी की सही वजह पता लगाने में देरी हो सकती है. इससे इलाज महंगा भी हो सकता है और समय भी बर्बाद होता है.
IVF शुरू करने से पहले कौन-कौन से जरूरी टेस्ट कराए जाते हैं?
हर मरीज की स्थिति अलग होती है, इसलिए जांच भी उसी के अनुसार तय की जाती है. फिर भी कुछ बेसलाइन टेस्ट लगभग हर कपल के लिए जरूरी होते हैं.
महिलाओं के लिए-
AMH (Anti-Müllerian Hormone), जिससे अंडाशय की क्षमता का पता चलता है.
ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासाउंड और AFC (Antral Follicle Count)
हार्मोन प्रोफाइल, जिसमें TSH और Prolactin सहित अन्य जरूरी जांच शामिल होती हैं.
जरूरत पड़ने पर गर्भाशय और फैलोपियन ट्यूब की जांच.
किसी भी तरह के इंपेक्शन की स्क्रीनिंग.
पुरुषों के लिए-
सीमन एनालिसिस
जरूरत होने पर स्पर्म फंक्शन या DNA Fragmentation टेस्ट
संक्रमण संबंधी जांच
इन जांचों का उद्देश्य केवल यह तय करना नहीं होता कि IVF करना है या नहीं, बल्कि इलाज को बेहतर बनाकर सफलता की संभावना बढ़ाना भी होता है. आमतौर पर शुरुआती फर्टिलिटी जांच पर 10 हजार से 25 हजार रुपये तक खर्च आता है. अगर जेनेटिक टेस्ट, एडवांस स्पर्म टेस्ट या हिस्टेरोस्कोपी जैसी विशेष जांच करनी पड़े तो खर्च बढ़ सकता है. यह समझना जरूरी है कि हर कपल को हर टेस्ट कराने की जरूरत नहीं होती. जांच हमेशा मेडिकल हिस्ट्री और डॉक्टर की सलाह के आधार पर होनी चाहिए.
पहली बार IVF कराने जा रहे कपल्स को आप क्या सलाह देंगे?
डॉ. निहिता बताती हैं, सबसे पहले दूसरों के अनुभवों से अपनी तुलना मत कीजिए. हर कपल की फर्टिलिटी जर्नी अलग होती है. महिला की उम्र, अंडाणु की गुणवत्ता, स्पर्म की गुणवत्ता, भ्रूण की गुणवत्ता, मेडिकल हिस्ट्री और पहले हुए इलाज...ये सभी बातें IVF के नतीजे को प्रभावित करती हैं.
डॉक्टर से खुलकर सवाल पूछिए, अपना इलाज समझिए और वास्तविक उम्मीदों के साथ आगे बढ़िए. IVF एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, इसलिए हर मरीज के लिए इलाज भी अलग होता है.
टेस्ट ट्यूब बेबी में कितना खर्च आता है?
भारत में आईवीएफ का एक साइकिल पूरा करने में औसतन 1.5 लाख से 2 लाख तक का खर्च आता है. इसमें दवाइयों और प्रोजेस्ट्रोन के इंजेक्शन का खर्च शामिल नहीं है. भारत में हर साल करीब 3-3.5 लाख IVF साइकिल की जाती हैं.
IVF शुरू करने से पहले कपल्स सबसे बड़ी कौन-सी गलतियां करते हैं?
जरूरत होने के बावजूद सालों तक इलाज टालते रहना.
एक साथ कई क्लीनिकों से सलाह लेकर भ्रमित हो जाना.
यह मान लेना कि इंफर्टिलिटी केवल महिला की समस्या है.
इंटरनेट या घरेलू नुस्खों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना.
यह सोच लेना कि IVF के पहले ही प्रयास में गर्भधारण की गारंटी मिल जाएगी.
IVF से जुड़े 5 बड़े मिथक और फैक्ट
मिथ 1: IVF से हुई प्रेग्नेंसी में बच्चे का जन्म सिर्फ सिजेरियन से होता है.
फैक्ट: यह पूरी तरह गलत है. IVF में केवल अंडाणु और शुक्राणु का Fertilization शरीर के बाहर लैब में कराया जाता है. इसके बाद भ्रूण का विकास गर्भाशय में बिल्कुल सामान्य प्रेग्नेंसी की तरह होता है. इसलिए डिलीवरी नॉर्मल होगी या सिजेरियन, यह पूरी तरह मां और बच्चे की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है, न कि IVF पर.
मिथ 2: IVF में गर्भपात का खतरा ज्यादा होता है?
फैक्ट: सामान्य गर्भावस्था की तरह IVF से हुई प्रेग्नेंसी में भी गर्भपात का जोखिम लगभग समान होता है. IVF केवल गर्भधारण कराने की तकनीक है. एक बार भ्रूण गर्भाशय में स्थापित हो जाए, तो आगे की प्रेग्नेंसी सामान्य तरीके से ही आगे बढ़ती है.
मिथ 3: IVF के बाद पूरे 9 महीने बेड रेस्ट करना जरूरी होता है.
फैक्ट: ऐसा बिल्कुल नहीं है. IVF सिर्फ गर्भधारण कराने की प्रक्रिया है. गर्भ ठहरने के बाद प्रेग्नेंसी सामान्य गर्भावस्था की तरह ही आगे बढ़ती है. इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार महिला रोजमर्रा के अधिकांश काम कर सकती है.
मिथ 4: IVF में सारे अंडे निकल जाने से जल्दी मेनोपॉज आ जाता है.
फैक्ट: यह भी एक आम गलतफहमी है. हर महीने महिला की ओवरी में कई अंडे विकसित होना शुरू होते हैं, लेकिन सामान्य तौर पर उनमें से केवल एक ही अंडा परिपक्व होकर ओव्यूलेट करता है. बाकी अंडे वैसे ही नष्ट हो जाते हैं. IVF के दौरान उन्हीं अंडों को निकाला जाता है, जो उस महीने स्वाभाविक रूप से खत्म हो जाते. इससे भविष्य में अंडे बनने की प्रक्रिया प्रभावित नहीं होती और न ही समय से पहले मेनोपॉज आता है.