सुबह उठते ही मोबाइल देखना... दिनभर लैपटॉप पर काम करना और रात में सोने से पहले फिर फोन चलाना आजकल ज्यादातर लोग यही करते हैं. ऐसे में अगर शाम तक आंखों में जलन, सूखापन या थकान महसूस हो, तो इसे सिर्फ स्क्रीन की थकान मानकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं. कई बार आंखों की ये छोटी-छोटी परेशानियां शरीर की पोषण संबंधी जरूरतों, नजर के नंबर या आंखों की किसी समस्या का संकेत भी हो सकती हैं. वर्ल्ड साइट डे के मौके पर जानते हैं कि आंखें हमें किन संकेतों से सावधान करती हैं और स्क्रीन टाइम, सिरदर्द, कॉन्टैक्ट लेंस और खान-पान का आंखों की सेहत से क्या संबंध है.
आंखें सूखती हैं तो इसे नजरअंदाज न करें
मैक्स मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल की आई स्पेशलिस्ट डॉ. जस्मिता पोपली के अनुसार, स्क्रीन पर लगातार ध्यान लगाने के दौरान हमारी पलकें कम झपकती हैं. इससे आंखों की नमी कम हो सकती है और जलन, थकान या सूखापन महसूस हो सकता है. इसलिए स्क्रीन टाइम कम करना जरूरी है. आंखों को पर्याप्त ब्रेक दें. आसपास के वातावरण का भी ध्यान रखें. अपने पोषण और शरीर में पानी की पर्याप्त मात्रा पर नजर रखें.
बार-बार सिरदर्द हो तो वजह आंखों का नंबर भी हो सकता है
अगर दिन खत्म होते-होते माथे, कनपटी या आंखों के पीछे सिरदर्द होने लगता है, तो इसकी वजह सिर्फ तनाव या थकान नहीं हो सकती. कई बार आंखों की समस्या भी इसका कारण होती है. डॉ. जस्मिता पोपली के अनुसार, मायोपिया यानी दूर की चीजें साफ न दिखना, हाइपरमेट्रोपिया, प्रेसबायोपिया और एस्टिग्मेटिज्म जैसे रिफ्रैक्टिव एरर सिरदर्द की वजह बन सकते हैं. प्रेसबायोपिया आमतौर पर 40 साल की उम्र के बाद देखने को मिलता है.
जब आंखों को साफ देखने के लिए लगातार फोकस और दोबारा फोकस करना पड़ता है, रोशनी के अनुसार खुद को एडजस्ट करना पड़ता है या लगातार मूवमेंट को ट्रैक करना पड़ता है, तो आंखों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है. ऐसे सिरदर्द अक्सर दोपहर या शाम को, लंबे समय तक पढ़ने, कंप्यूटर या मोबाइल इस्तेमाल करने के बाद दिखाई देते हैं. इसके अलावा कन्वर्जेंस इनसफिशिएंसी और एकॉमोडेटिव स्पाज्म भी सिरदर्द और कुछ समय के लिए धुंधला दिखने की वजह बन सकते हैं.
हालांकि हर सिरदर्द आंखों की वजह से नहीं होता. साइनसाइटिस और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी इसके पीछे हो सकती हैं. अगर सिरदर्द के साथ आंखों के सामने चमकती रोशनी, फ्लोटर्स या कुछ समय के लिए नजर कम होने जैसी समस्या हो तो आंखों की जांच जरूरी है. अचानक नजर कम होना और सिरदर्द होना तत्काल आंखों की जांच की जरूरत का संकेत है.
कॉन्टैक्ट लेंस पहनते हैं तो इन गलतियों से बचें
कॉन्टैक्ट लेंस नजर ठीक करने और कॉस्मेटिक इस्तेमाल दोनों के लिए आम हैं, लेकिन इनकी सफाई और इस्तेमाल में छोटी गलती भी आंखों को नुकसान पहुंचा सकती है. लेंस लगाने या निकालने से पहले हाथों को अच्छी तरह धोकर लिंट-फ्री तौलिये से सुखाना चाहिए. लेंस के लिए सिर्फ निर्धारित कॉन्टैक्ट लेंस सॉल्यूशन इस्तेमाल करें, पानी नहीं. हर बार पुराना सॉल्यूशन निकालकर नया सॉल्यूशन इस्तेमाल करें और लेंस केस की नियमित सफाई करें.
डॉक्टर के अनुसार, जब तक डॉक्टर ने विशेष रूप से सलाह न दी हो, कॉन्टैक्ट लेंस लगाकर सोना नहीं चाहिए. स्विमिंग या शॉवर लेने से पहले भी लेंस निकाल देना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण या आंखों को नुकसान का खतरा बढ़ सकता है. डेली डिस्पोजेबल, फोर्टनाइटली या मंथली लेंस को उनकी निर्धारित अवधि के बाद जरूर बदलें. लंबे समय तक इस्तेमाल करने से लेंस पर प्रोटीन जमा हो सकता है, जिससे जलन और आंखों को नुकसान हो सकता है.
अगर लेंस पहनने के बाद आंख लाल हो, जलन, दर्द, असहजता या आंख में कुछ पड़ा होने जैसा महसूस हो तो लेंस तुरंत निकालें और आंखों के डॉक्टर को दिखाएं. कुछ मामलों में केवल लुब्रिकेंट आई ड्रॉप की जरूरत हो सकती है, लेकिन कभी-कभी समस्या गंभीर भी हो सकती है और समय पर इलाज न मिलने पर बढ़ सकती है.
आंखों के लिए ये 5 पोषक तत्व भी जरूरी
1. विटामिन A: यह आंखों की रेटिना को स्वस्थ रखने और ड्राई आई से बचाने में मदद करता है. बच्चों में इसकी कमी से नाइट ब्लाइंडनेस और बिटॉट स्पॉट हो सकते हैं. गाजर, पालक और शकरकंद इसके सोर्स हैं.
2. जिंक: यह विटामिन A को रेटिना तक पहुंचाने में मदद करता है. इसलिए डाइट में पर्याप्त जिंक होना भी जरूरी है.
3. विटामिन C और E: ये एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करते हैं और आंखों के फैटी एसिड की सुरक्षा में मदद करते हैं. बादाम और एवोकाडो इनके अच्छे सोर्स हैं.
4. ओमेगा-3 और ओमेगा-6: इनमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं और ये ड्राई आई को मैनेज करने में मदद कर सकते हैं. डाइट से पर्याप्त मात्रा न मिलने पर डॉक्टर सप्लीमेंट की सलाह दे सकते हैं.
5. ल्यूटिन और जियाजैंथिन: ये प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट हैं, जो मैक्युला की सुरक्षा करते हैं. इससे स्पष्ट नजर बनाए रखने में मदद मिलती है और उम्र से जुड़ी मैक्युलर डिजनरेशन को देर से होने में मदद मिल सकती है. पालक और ब्रोकली इनके स्रोत हैं.