फेफड़े में भर गए थे पत्थर के कण, 6 घंटे के ऑपरेशन में 80 बोतल सलाइन वाटर का इस्तेमाल... डॉक्टरों ने बचाई मजदूर की जान

जहां सब हार जाते हैं, वहां से डॉक्टर की उम्मीद और कोशिश शुरू होती है. ऐसा ही मामला सामने आया AIMS से. जहां डॉक्टर ने दो लोगों की जान बचाई है. जानें क्या है पूरा मामला.

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gnttv.com
  • भोपाल,
  • 03 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:29 PM IST

एम्स भोपाल ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता हासिल की है. यहां पल्मोनरी मेडिसिन विभाग की टीम ने दो बेहद गंभीर मरीजों का ऐसा इलाज किया, जो अब तक सेंट्रल भारत में पहली बार किया गया. इन दोनों मामलों में मरीजों की जान पर खतरा था, लेकिन समय पर सही तकनीक और डॉक्टरों की विशेषज्ञता से उन्हें नया जीवन मिल सका.

पहला मामला- स्टोन क्रशर में काम करने वाले मजदूर की जान बची
पहला मरीज एक मजदूर था, जो लंबे समय से स्टोन क्रशर प्लांट में काम कर रहा था. लगातार धूल और पत्थरों के बेहद महीन कण सांस के साथ उसके फेफड़ों में जाते रहे. समय के साथ ये कण फेफड़ों की वायु थैलियों में जमा होकर गाढ़े पदार्थ में बदल गए.

इस कारण मरीज के फेफड़े सख्त हो गए, लगभग पत्थर जैसे. ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका था और मरीज को सांस लेने में भारी परेशानी हो रही थी.

होल लंग लैवेज तकनीक से फेफड़ों की गहन सफाई
मरीज की गंभीर हालत को देखते हुए डॉक्टरों ने होल लंग लैवेज नाम की अत्याधुनिक तकनीक अपनाई. इस प्रक्रिया में सलाइन वाटर की मदद से फेफड़ों की गहराई तक सफाई की जाती है.

करीब 6 घंटे चले इस जटिल ऑपरेशन में डॉक्टरों ने लगभग 80 बोतल सलाइन वाटर का उपयोग किया. इससे फेफड़ों में जमी परत धीरे-धीरे साफ हुई. ऑपरेशन के बाद मरीज की सांस लेने की क्षमता में सुधार हुआ और ऑक्सीजन स्तर सामान्य होने लगा.

दूसरा मामला- कैंसर से बंद हुआ श्वसन मार्ग फिर खुला

दूसरा मामला एक ऐसे मरीज का था, जिसे कैंसर के कारण सांस की मुख्य नली पूरी तरह बंद हो चुकी थी. इसका असर यह हुआ कि उसका एक फेफड़ा काम करना बंद कर चुका था.

पल्मोनरी टीम ने पहले ब्रोंकोस्कोपिक डिबल्किंग के जरिए ट्यूमर को हटाया. इसके बाद प्रदेश में पहली बार ‘Y’ आकार के विशेष मेटल स्टेंट का सफल प्रत्यारोपण किया गया.

‘Y’ शेप स्टेंट से मिली तुरंत राहत

स्टेंट लगने के तुरंत बाद मरीज को सांस लेने में राहत मिली. बंद पड़ा फेफड़ा फिर से काम करने लगा. यह इलाज न केवल तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण था, बल्कि समय पर किया जाना भी बेहद जरूरी था.

मध्य भारत के लिए मील का पत्थर

एम्स भोपाल की यह उपलब्धि दिखाती है कि अब गंभीर और जटिल फेफड़ों के इलाज के लिए मरीजों को बड़े महानगरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. यह सफलता चिकित्सा जगत के साथ-साथ आम लोगों के लिए भी एक बड़ी राहत है.

(रिपोर्ट- रवीश पाल)

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