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बंगाल से हजारों किमी दूर, अकोला में बसाया अपना गांव, सोने-चांदी के कारीगरों ने सजाया दुर्गा पूजा पंडाल, 9 दिन तक बंगाली परंपरा से करते हैं मां की आराधना

बंगाली पूजा कमेटी के अध्यक्ष कल्याण समन के मुताबिक, यहां कोशिश की जाती है कि मां दुर्गा की पूजा उसी परंपरा और विधि-विधान से हो, जिस तरह पश्चिम बंगाल में की जाती है.

Durga Puja
धनंजय साबले
  • अकोला,
  • 16 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:12 AM IST

दुर्गा पूजा का नाम आते ही पश्चिम बंगाल और कोलकाता के भव्य पंडालों की तस्वीर सामने आ जाती है. बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं, पारंपरिक सजावट और मां दुर्गा के साथ उनके पूरे परिवार के दर्शन इस उत्सव को खास बनाते हैं. महाराष्ट्र के अकोला में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है. यहां के सार्वजनिक दुर्गोत्सव मंडल, बंगाली पूजा कमेटी ने बंगाल की परंपरा के अनुसार पंडाल सजाया है. मां दुर्गा के साथ मां लक्ष्मी, मां सरस्वती, भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं. यह पंडाल सिर्फ पूजा की जगह नहीं, बल्कि बंगाल से दूर रह रहे लोगों के लिए अपने गांव, परिवार और संस्कृति से जुड़ने का जरिया भी है. रोजगार के लिए अपना घर छोड़कर अकोला आए बंगाली कारीगर यहां मां दुर्गा की आराधना के जरिए अपनी परंपराओं को जिंदा रखे हुए हैं.

काम की व्यस्तता में गांव जाना मुश्किल
अकोला में पश्चिम बंगाल से आए कई कारीगर और कामगार सोने-चांदी के आभूषण बनाने का काम करते हैं. वे वर्षों से यहां रहकर अपना रोजगार चला रहे हैं. दशहरा और दिवाली का समय उनके काम के लिहाज से सबसे व्यस्त होता है. ऐसे में दुर्गा पूजा के लिए अपने गांव लौटना हर बार संभव नहीं हो पाता.

इसके बावजूद मां दुर्गा के प्रति उनकी आस्था कम नहीं होती. इसी वजह से वे अकोला में ही बंगाल जैसा माहौल तैयार करते हैं. पंडाल को पारंपरिक तरीके से सजाया जाता है और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा की जाती है. इससे उन्हें अपने गांव और वहां मनाए जाने वाले त्योहार की याद आती है.

बंगाल से बुलाते हैं पुजारी, 9 दिन होती है पूजा
इस आयोजन को बंगाल की परंपरा के अनुसार मनाने के लिए पश्चिम बंगाल से पुजारी बुलाए जाते हैं. उनकी देखरेख में विधि-विधान से पूजा होती है. नौ दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में श्रद्धालु नियमित रूप से मां दुर्गा की आराधना करते हैं. पूजा की हर रस्म में बंगाल की संस्कृति और परंपराओं की झलक दिखाई देती है. बंगाली पूजा कमेटी के अध्यक्ष कल्याण समन के मुताबिक, यहां कोशिश की जाती है कि मां दुर्गा की पूजा उसी परंपरा और विधि-विधान से हो, जिस तरह पश्चिम बंगाल में की जाती है. इससे अकोला में रह रहे बंगाली परिवारों को अपने गांव जैसा माहौल मिलता है और वे अपनी संस्कृति से जुड़े रहते हैं.

आस्था ने कम की घर से दूर रहने की दूरी
रोजगार के लिए दूसरे शहर में रहना और त्योहारों पर परिवार से दूर होना आसान नहीं है. खासकर तब, जब दुर्गा पूजा जैसा बड़ा उत्सव हो. लेकिन अकोला के बंगाली कारीगरों ने अपनी आस्था के सहारे इस दूरी को कम करने का रास्ता निकाल लिया है. पंडाल में मां दुर्गा के दर्शन, पारंपरिक पूजा और अपने लोगों के साथ त्योहार मनाने से उन्हें घर जैसा अपनापन मिलता है. बंगाल से हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी वे अपनी मिट्टी और संस्कृति से जुड़े हुए हैं.

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