इन दिनों सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय (National Crafts Museum) काफी ट्रेंड कर रहा है. हर 4-5 रील में से एक रील तो मेरे इंस्टाग्राम फीड में आ ही जाती है. बस फिर क्या था.. मैंने तो ठान लिया कि यहां तो जाना ही पड़ेगा... बिना कुछ सोचे मैं इस शनिवार नेशनल क्राफ्ट म्यूजियम चली ही गई. मैं वहां अपनी एक फ्रेंड के साथ स्कूटी से गई थी. वहां पार्किंग की अच्छी व्यवस्था थी, हमने स्कूटी पार्किंग पर लगाई और आगे चल पड़े.
वहां की सबसे खास बात थी की वहां प्रवेश निःशुल्क था. सबसे पहले जब मैं अंदर गई तो मैंने सोचा नहीं था कि ये जगह इतनी खूबसूरत होगी. क्योंकि, बाहर से देखने पर यह जगह साधारण सी लगती है, लेकिन अंदर जाने पर यह एक हवेली की तरह खुल जाती है. एक कमरा दूसरे कमरे से जुड़ा हुआ है, और हर कमरे को पारंपरिक लकड़ी के दरवाजों से अलग किया गया है, जिससे ऐसा महसूस होता है मानो आप किसी पुराने घर में घूम रहे हों.
अंदर जाते ही बीचों बीच एक बड़ा सा बरगद का पेड़ है, जिसे देख लगता है कि आप किसी गांव के चौक पर खड़े हों. ये सब देखते ही ऐसा मेहसूस हुआ जैसे कि मैं अपने नानी के गांव आ गई हूं. वहां इतनी शांति और सुकून था कि मैं शायद ही वो एहसास आपको बयान कर पाऊं. चारो तरफ चिड़ियों की चहचहाहट, मोर की आवाज, झूमता हुआ राजस्थानी संगीत और भारत के विभिन्न हिस्सों के कलाकारों की कलाएं... मानो एकदम अलग ही दुनिया में आ गई हूं. तब मुझे समझ आया कि आखिर ये जगह इतनी ट्रेंड में है क्यों. साथ ही ये भी समझ में आया कि Zen-Z इस जगह को इतना पसंद क्यों कर रहे हैं.
मैने एक शहर में 28 राज्य देखा
सबसे ज्यादा सरप्राइज था कि दिल्ली में इतनी सुकून भरी जगह भी है? क्योंकि, मैंने शायद ही इतनी प्यारी और शांत जगह दिल्ली में देखी होगी. वैसे भी दिल्ली में ऐसी जगह ढूंढना जहां भीड़ न हो, मानो जैसे 'तिनके के ढेर में सुई ढूंढना.' जब मैं आगे बढ़ी तो चारों तरफ भारत के अलग-अलग हिस्सों को दिखाया गया था. जैसे- एक शहर में आपने 28 राज्य देख लिए हों. वहां 5,000 से अधिक दुर्लभ और विशिष्ट कलाकृतियां थीं जो चित्रकला, कढ़ाई, वस्त्र, मिट्टी, पत्थर और लकड़ी के विभिन्न शिल्पों के माध्यम से भारतीय कला की निरंतर परंपरा को बयां रही थीं.
अंदर जाने के बाद आपको एक प्रदर्शनी नजर आएगी, जिसमें खूबसूरती से बनाया गया एक छोटा सा गांव दिखता है. पास ही में आपको राजस्थान और पश्चिम बंगाल सहित देश के विभिन्न हिस्सों से लाई गई कठपुतलियां देखने को मिलेगा, जिनके रंग मिट्टी के रंग वाले अंदरूनी हिस्सों के बीच बेहद आकर्षक लगते हैं. इसे एक गांव की तरह बनाया गया है, देखने में ऐसा लगता है जैसे इस जगह को शहर और शहर के लोगों के कोई लेना देना नहीं है.
आगे बढ़ने पर मुझे एक आंगन जैसा दिखा, जिसमें छत लगी हुई थी. छत के नीचे 4 राजस्थानी ट्रेडिशनल गाना गा रहे थे और 7-8 महिलाएं उस गाने पर झूम रही थीं. गाना इतना बढ़िया था कि मैं भी बीच में चली गई और लगभग 15 मिनट तक नाचती रही. मस्ती करने के बाद सबसे खास जगह पर गई. ये वही जगह थी जिसके लिए मैं नेशनल क्राफ्ट म्यूजियम गई थी.
वो जगह थी जहां लोग अपने हाथों से मिट्टी की कलाकृतियां बना सकते थे. ये काफी सुकून भरा था जब मैंने अपने हाथों से एक कुल्हड़ बनाया, वो एक्पीरियंस ही अलग था. पता है सबसे खास बात क्या है? ये सब कुछ फ्री था. मुझे एक रुपये भी खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ी और इतना खास पल बना लिया.
ट्रेडिशनल खाने का मजा भी लिया...
आखिर में सब कुछ घूमने के बाद एक घंटे के लिए मैं वहां सुकून से बैठी. फिर मुझे भूख लग गई तो मैं वहीं पर बने 'कैफे लोटा' चली गई और चाय पिया. इतना घूमने के बाद भूख तो लगनी ही थी. फिर मैंने मंगाई कुमाऊनी थाली, ये थोड़ी महंगी थी. लेकिन खाना खाने के बाद समझ आया कि आखिर इतनी महंगी क्यों थी.
मेरा यहां जाने का एक्सपीरियंस काफी अच्छा था और मैंने तो अब सोच लिया है जब भी थोड़ा टाइम चाहिए होगा मैं तो नेशनल क्राफ्ट म्यूजियम जाउंगी और शांति के पल बिताउंगी.
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