इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के बारे में महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अगर पत्नी पति के नाम दर्ज खेत पर कृषि कार्य करती है और उसकी आजीविका का मुख्य स्रोत खेती है, तो उसे सिर्फ इसलिए योजना से बाहर नहीं किया जा सकता कि खतौनी में उसका नाम नहीं या वह बटाईदार नहीं है. इसके बावजूद वह क्लॉज 2(2) के तहत 'कमाऊ सदस्य' है और योजना का लाभ पाने की हकदार है. सुरेन्द्र की याचिका पर न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया है.
महिला के पति ने दायर की याचिका-
कुशीनगर के याची सुरेन्द्र की पत्नी मीरा की 20 अगस्त 2020 को सड़क हादसे में मौत हो गई थी. मामला थाना जटहा बाजार में दर्ज की गई. याची ने योजना में आवेदन किया. खतौनी में याची अपने भाइयों के साथ सह-खातेदार है. जिलाधिकारी कुशीनगर ने 24 मई 2022 को दावा खारिज कर दिया. जिलाधिकारी ने कहा कि मृतका के नाम कोई जमीन नहीं है. इसलिए वह बटाईदार भी नहीं है.
खेती का काम करती थी मीरा- याची
याची अधिवक्ता का कहना था कि मीरा खेती का काम करती थी. परिवार उसी से चलता था. पति के खेत पर और दूसरे किसानों के यहाँ भी कृषि मजदूरी करती थी. परिवार में याची और बच्चे उसकी कमाई पर निर्भर थे. वह क्लॉज 2(2) खातेदार/सह-खातेदार के परिवार की कमाऊ सदस्य में आती है. जिलाधिकारी ने 28 फरवरी 2020 के शासनादेश को गलत पढ़ा.
कोर्ट ने क्या कहा?
सरकारी वकील ने कहा कि नायब तहसीलदार, तहसील पडरौना के हलफनामे से मीरा खतौनी में सह-खातेदार नहीं है, सह-खातेदार याची और उसके भाई. वह गृहिणी थी, सह-खातेदार होने का कोई दस्तावेज नहीं है. इसलिए आदेश सही है. कोर्ट ने कहा कि क्लॉज 2(2) वाली फैमिली मेंबर को 2(1) में जमीन अपने नाम या 2(3) में बटाईदार साबित करने की जरूरत नहीं है. अगर 2(2) में भी जमीन मृतका के नाम मांगेंगे तो 2(1) और 2(2) में फर्क ही नहीं रहेगा. कोर्ट ने कहा कि कल्याण कारी योजना लागू करने के लिए नाम नहीं, असली कृषि भूमिका और आजीविका देखनी होगी.
कृषि मृतक के नाम होना जरूरी नहीं, असली कृषि कार्य और मुख्य आजीविका देखनी चाहिए. बड़े परिवार के नाम जमीन होने पर भी पति-पत्नी, जो उस पर खेती करते हैं, बाहर नहीं माने जा सकते. कृषि निर्भरता से इनकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि एक परिवार में एक से ज्यादा कमाऊ सदस्य हो सकते हैं, पति के पास जमीन/कमाई होने से पत्नी जो खेती करती है, वह बाहर नहीं मानी जायेगी. पत्नी का गृहिणी होना कमाऊ सदस्य होने से उसे बाहर नहीं करता., पति से अलग वेतन मिलना क्लॉज 2(2) में शर्त नहीं है. याची सह-खातेदार है, मृतका उसकी पत्नी, परिवार की सदस्य हैं. परिवार रजिस्टर में पेशा कृषि दर्ज है. याची का यह कहना कि वह सह-खातेदार खुद थी, खतौनी से साबित नहीं होता. इसलिए 2(1) में नहीं आती. पर 2(2) में दावा अलग से देखना होगा.
4 हफ्ते में नया आदेश जारी करने का निर्देश-
सरकार ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दे सकी कि उसकी मुख्य आजीविका खेती नहीं थी. एफआईआर में याची की घर के सामने चाय की दुकान का जिक्र है, पर पति की दुकान से पत्नी की मुख्य आजीविका दुकान साबित नहीं होती. जांच उसकी कृषि कार्य की होगी. दूसरे किसानों के यहाँ काम करना भी कृषि पेशे का हिस्सा है. पर हक पति की जमीन पर काम से ही क्लॉज 2(2) में बनता है. बटाईदार मानने की जरूरत नहीं है. कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए जिलाधिकारी कुशीनगर का आदेश निरस्त कर दिया और निर्देश दिया कि 4 हफ्ते में नया आदेश पारित करें. कोर्ट ने साफ किया कि मीरा अपने पति के नाम दर्ज जोत से कृषि आय पर निर्भर कमाऊ सदस्य थी. उसे क्लॉज 2(2) से बाहर नहीं कर सकते. कोर्ट ने कहा कि याची उसकी दुर्घटना मृत्यु पर योजना के लाभ का हकदार है.
ये भी पढ़ें: