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'सपनों की पहली पाठशाला', आंगनवाड़ी से 12वीं तक का सफर और आत्मनिर्भर भारत की जमीनी तस्वीर

करिश्मा का कहना है कि, 'मैंने आंगनवाड़ी से शुरुआत की और 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की. सरकारी योजनाओं के तहत बेटियों को हर महीने 700 रुपये की आर्थिक सहायता मिलती थी, जिससे पढ़ाई जारी रखने में बहुत मदद मिली. अब मैं अपने गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हूं.

करिश्मा
gnttv.com
  • आणंद,
  • 05 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 5:32 PM IST

बचपन में पड़ी एक मजबूत नींव कैसे एक साधारण ग्रामीण बेटी की जिंदगी बदल सकती है? गुजरात के आणंद जिले का मेहलाव गांव. इसी गांव की एक बेटी है- करिश्मा. कभी आंगनवाड़ी में खेल-खेल में अक्षर सीखने वाली करिश्मा आज खुद गांव के नन्हें बच्चों का भविष्य संवार रही हैं.

माता-पिता ने गांव के आंगनवाड़ी में भेजा
सालों पहले जब करिश्मा के माता-पिता ने उन्हें गांव की नजदीकी आंगनवाड़ी में भेजा था, तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा था कि यह व्यवस्था उनके जीवन की दिशा ही बदल देगी. सिर्फ अक्षरों की पहचान ही नहीं, बल्कि साफ-सफाई की सीख और पोषण की थाली. यह सब करिश्मा के बचपन का अहम हिस्सा बने.

आंगनवाड़ी में मिला पौष्टिक खाना और पढ़ाई का माहौल
करिश्मा का कहना है कि, 'मैं जब छोटी थी, तब मेरे माता-पिता ने मुझे आंगनवाड़ी में रखा था. वहां बहुत अच्छा खाना, पीने के लिए साफ पानी और हाथ धोकर खाना खाने की आदत सिखाई जाती थी. खेल-खेल में पढ़ाई होती थी और मैडम खुद घर से लेने और छोड़ने आती थीं. हमारा बहुत प्यार से ध्यान रखा जाता था. हर दिन अलग-अलग हेल्दी खाना, जैसे सुखड़ी और खिचड़ी दी जाती थी. मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की आभारी हूं कि उन्होंने ऐसी व्यवस्था बनाई, जिससे हम जैसे बच्चों को आगे बढ़ने का मौका मिला.'

बेटियों की शिक्षा के लिए मिली आर्थिक मदद बनी सहारा
आंगनवाड़ी से शुरू हुई यह पढ़ाई सिर्फ प्राथमिक शिक्षा पर जाकर नहीं रुकी. करिश्मा ने अपनी मेहनत और लगन से 12वीं कक्षा उत्तीर्ण की. इस पढ़ाई के सफर में सरकारी योजनाओं ने भी एक मददगार का रोल निभाया, जहां बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मिलने वाली छात्रवृत्ति/आर्थिक सहायता ने पढ़ाई की राह को आसान बनाए रखा.

हर महीने 700 रुपए की मदद 
करिश्मा का कहना है कि, 'मैंने आंगनवाड़ी से शुरुआत की और 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की. सरकारी योजनाओं के तहत बेटियों को हर महीने 700 रुपये की आर्थिक सहायता मिलती थी, जिससे पढ़ाई जारी रखने में बहुत मदद मिली. अब मैं अपने गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हूं. जो भी मैंने अपने शिक्षकों और आंगनवाड़ी से सीखा, वही सब इन बच्चों को सिखाती हूं. मैं सभी माता-पिता से यही कहना चाहती हूं कि अपने बच्चों को आंगनवाड़ी ज़रूर भेजें. वहां बच्चों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है और उनका भविष्य संवरता है.'

अपनी पढ़ाई को बनाया बच्चों के भविष्य को संवारने का जरिया
शिक्षा का सबसे खूबसूरत पहलू यही होता है कि यह बांटने से बढ़ती है. 12वीं पास करने के बाद करिश्मा ने घर बैठने के बजाय अपने गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. जो कुछ उन्होंने आंगनवाड़ी और स्कूल से सीखा, वही संस्कार और ज्ञान अब वे अगली पीढ़ी को सौंप रही हैं. करिश्मा की यह कहानी सिर्फ एक व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह सबूत है कि जब बुनियादी स्तर पर पोषण, शिक्षा और सुरक्षा एक साथ मिलती है, तो गांव की बेटियां आत्मनिर्भर बनकर समाज को नई दिशा दे सकती हैं.

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