भीषण गर्मी के बीच भले ही आज कूलर, एसी और फ्रिज जैसे आधुनिक साधनों की भरमार हो गई हो, लेकिन मिट्टी के घड़ों यानी मटकों की उपयोगिता आज भी कम नहीं हुई है. गर्मी बढ़ते ही मुंबई के बाजारों में एक बार फिर मटकों की मांग तेज हो गई है. इस बार सिर्फ पारंपरिक घड़े ही नहीं, बल्कि रंग-बिरंगे और डिजाइनर मटके भी लोगों को खूब आकर्षित कर रहे हैं. ठंडे और प्राकृतिक पानी के लिए लोग आज भी मटके को सबसे भरोसेमंद विकल्प मान रहे हैं.
बाजारों में बढ़ी ग्राहकों की भीड़
अप्रैल के महीने में तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच मुंबई के चौक-चौराहों, पारंपरिक बाजारों और सड़क किनारे मटकों की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ साफ देखी जा रही है.
लोग गर्मी से राहत पाने के लिए मिट्टी के घड़े खरीदने पहुंच रहे हैं. दुकानदारों का कहना है कि फ्रिज का पानी भले तुरंत ठंडा होता है, लेकिन मटके का पानी प्राकृतिक ठंडक और स्वाद देता है, जिसकी वजह से इसकी मांग हर साल बनी रहती है.
200 से 550 रुपये तक मिल रहे मटके
इस समय बाजार में 200 रुपये से लेकर 550 रुपये तक के मटके उपलब्ध हैं. कीमत उनके आकार, डिजाइन और गुणवत्ता के हिसाब से तय हो रही है. अब बाजार में केवल साधारण मटके ही नहीं, बल्कि रंगीन, डिजाइनर और आधुनिक सुविधाओं वाले विकल्प भी मौजूद हैं, जो खासतौर पर शहर के ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं.
मिट्टी की बोतलें बनीं आकर्षण का केंद्र
छोटी मटकी, बड़ा मटका और पशु-पक्षियों के लिए पानी रखने वाली कड़ाई के साथ-साथ इस बार मिट्टी की बोतलें सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं. कई लोग इन्हें घर और ऑफिस दोनों जगह इस्तेमाल करने के लिए खरीद रहे हैं. यह न सिर्फ देखने में आकर्षक लगती हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतर मानी जाती हैं.
गुजरात से आ रहे हैं मटके
मुंबई के बाजारों में बिक रहे ज्यादातर मिट्टी के मटके गुजरात से लाए जा रहे हैं. वहां के कारीगर पारंपरिक तरीके से इन्हें तैयार करते हैं, जिसकी वजह से इनकी मांग ज्यादा रहती है.
मटकों की बढ़ती बिक्री यह साबित करती है कि परंपराएं कभी खत्म नहीं होतीं, बल्कि समय के साथ खुद को नए रूप में ढाल लेती हैं. भीषण गर्मी में ठंडक देने वाला यह साधारण सा घड़ा आज भी लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बना हुआ है. यह सिर्फ एक बर्तन नहीं, बल्कि परंपरा, स्वास्थ्य और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है.
(रिपोर्ट- धर्मेंद्र दुबे)
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