'मिट्टी में मिल जाऊंगा, लेकिन अब इन लोगों के साथ नहीं जाऊंगा'. नीतीश कुमार ने ये चर्चित बयान बीजेपी से अलग हटने के बाद बिहार विधानसभा में दी थी. आज भी ये बयान सियासी गलियारों में गूंजता है. लेकिन बिहार की सियासत में 'नीतीश' शब्द के मायने सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि अचानक यू-टर्न और बेजोड़ 'वोट इंजीनियरिंग' के रहे हैं. मंगलवार को जब सफेद कुर्ते-पाजामे में सजे नीतीश कुमार ने राजभवन की सीढ़ियां चढ़ीं और राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन को अपना इस्तीफा सौंपा, तो पटना की तपती गर्मी में भी सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. ये इस्तीफा सिर्फ एक मुख्यमंत्री का पद त्याग नहीं है, बल्कि उस 'सुशासन बाबू' की विदाई है, जिसने दो दशकों तक बिहार की किस्मत के पन्ने लिखे. बिहार की तकदीर और तस्वीर को बदलने के लिए अपने सभी पत्ते खोले. इधर से उधर हुए लेकिन मन में हमेशा बिहार और बिहार के लोगों का कल्याण रहा.
2005 में शुरू नीतीश की सियासत की असली कहानी-
बिहार की सियासत में राजनीतिक रूप से किसी 'रोचक' नेता को तलाशने की प्रतियोगिता हो, उसके विनर कैंडिडेट के रूप में आप नीतीश कुमार का नाम रख सकते हैं. खैर, नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर की असली कहानी नवंबर 2005 से शुरू होती है. हालांकि, साल 2000 में वे महज सात दिनों के लिए सीएम बने थे, लेकिन तब की वह टीस 2005 में एक जबरदस्त संकल्प के रूप में सामने आई. उस दौर के बिहार को याद कीजिए. शाम ढलते ही सड़कें सूनी हो जाती थीं, सरकारी दफ्तरों में टाइपराइटर की खटखटाहट के बीच फाइलें दम तोड़ देती थीं और 'जंगलराज' का ठप्पा राज्य की पहचान बन चुका था. सत्ता संभालते ही उन्होंने जो 'श्वेत पत्र' जारी किया था, उसमें बिहार की स्थिति बदतर बताई गई थी. उन्होंने कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए 'स्पीडी ट्रायल' का सहारा लिया. आर्म्स एक्ट के तहत अपराधियों को सजा दिलाने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने बिहार के आम आदमी के मन में राज्य का इकबाल बुलंद किया. हालांकि, इसमें वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता.
सत्ता के साथ आई कई चुनौतियां-
नीतीश ने सत्ता संभाली तो सबसे बड़ी चुनौती थी, प्रशासनिक ढांचे को पुनर्जीवित करना. इसमें उन्हें साथ मिला बीजेपी के दिग्गज नेता सुशील कुमार मोदी का. यह एक ऐसी जोड़ी थी जिसे अधिकारी आज भी परफेक्ट जुगलबंदी कहते हैं. सुशील मोदी हमेशा अपने हाथ में टैब लेकर चलते थे, जो उस दौर में बिहार के लिए अजूबे जैसा था. नीतीश और मोदी की जोड़ी ने बिहार को लालटेन के युग से निकालकर एलईडी की रोशनी की ओर ले जाने का संकल्प लिया. जानकार मानते हैं, पूरे देश भर की मीडिया रिपोर्ट मानती रही कि नीतीश कुमार एक जबरदस्त प्रशासक रहे. स्थिति ये होती थी कि उन्हें हर मीटिंग में यह याद रहता था कि पिछली बैठक में उन्होंने किस विभाग को क्या निर्देश दिए थे. नीतीश कुमार जानते थे कि बिहार में केवल विकास की बातें करने से चुनाव नहीं जीते जा सकते. उन्होंने बिहार की जटिल जातीय बुनावट को समझा. कुर्मी जाति से आने वाले नीतीश ने 'लव-कुश' यानी कुर्मी-कोइरी समीकरण को मजबूती दी, जिनकी आबादी भले ही सात फीसदी हो, लेकिन अपनी नीतियों से उन्होंने इसे 20 फीसदी के वोट बैंक में बदल दिया.
महिलाओं और ईबीसी का जीता दिल-
नीतीश कुमार ने महिलाओं और अति पिछड़ों (EBC) को अपना साइलेंट वोट बैंक बनाया. पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 फीसदी और ईबीसी को 20 फीसदी आरक्षण देकर उन्होंने एक ऐसा वर्ग खड़ा किया, जो पारंपरिक जातीय गोलबंदी से ऊपर उठकर नीतीश के लिए पारंपरिक वोट कवच बन गया. लोहिया के सिद्धांतों को दोहराते हुए वे अक्सर कहते थे कि औरत की कोई जाति नहीं होती, वो समाज का सबसे पिछड़ा हिस्सा है. उनकी 'साइकिल योजना' और 'यूनिफॉर्म योजना' ने बिहार की सामाजिक क्रांति में वो काम किया जो बड़ी-बड़ी रैलियां नहीं कर पाईं. बिहार की सड़कों पर साइकिल चलाती लड़कियां केवल शिक्षा का प्रतीक नहीं थीं, बल्कि सुधरती कानून-व्यवस्था का बिना खर्च वाला विज्ञापन बन गईं. स्थिति ये हुई कि देश के कई राज्यों ने नीतीश कुमार की इन योजनाओं का कॉपी किया. राजस्थान में अशोक गहलोत की बालिका स्कूटी योजना. मध्य प्रदेश या उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में इन योजनाओं को सराहा गया। इन्हें बकायदा लागू किया गया.
बिजली और सड़कों को लेकर अद्भुत काम-
साल 2006 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ओर से लाए गए श्वेत पत्र को समझें, तो बिहार में प्रति व्यक्ति बिजली खपत महज 60 किलोवाट प्रति घंटा थी. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि 2011-12 में यह बढ़कर 134 किलोवाट हुई और आज यह 374 किलोवाट प्रति घंटा तक जा पहुंची है. ग्रामीण सड़कों की हालत में क्रांतिकारी बदलाव आया. साल 2005-06 में जहाँ पूरे राज्य में महज 835 किलोमीटर ग्रामीण सड़कें बनी थीं, आज वह बढ़कर 1,19,067 किलोमीटर हो चुकी हैं. पटना के बेली रोड से लेकर मुजफ्फरपुर के फ्लाईओवरों तक, कंक्रीट का ढांचा तो तैयार हो गया. नीतीश का वह दावा कि बिहार के किसी भी कोने से पांच घंटे में पटना पहुंचा जा सकेगा, सड़क और पुलों के निर्माण से काफी हद तक सच के करीब पहुंचा. हालांकि, इतना कुछ करने के बाद भी नीतीश कुमार आलोचना और आलोचकों की टिप्पणी से नहीं बच सके. चर्या ये भी रही कि नीतीश राज में पत्थरों और तारों का जाल तो बिछा, लेकिन क्या वह आम बिहारी की गरीबी को जड़ से मिटा पाया? उनके कार्यकाल में चमक काफी हद तक मध्यम वर्ग और ठेकेदारी प्रथा तक सीमित रही. फ्लाईओवरों ने शहर की रफ्तार तो बढ़ाई, लेकिन हाशिए पर खड़े समाज के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति आज भी गंभीर बनी हुई है. ऐसा आलोचक आज भी कहते हुए सुने जा सकते हैं.
शुरुआती 8 साल स्वर्ण काल-
नीतीश कुमार के शुरुआती आठ साल को जानकार स्वर्ण काल बताते नहीं थकते. सार्वजनिक मंचों से बाद के दिनों में नीतीश कुमार अपने पुराने विकास कार्यों के भरोसे रहने लगे. पंचायत में महिलाओं को जगह दिला पाए, लेकिन असली अधिकार उनके पतियों के हाथ में सिमटा रहा. अपनी- अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाने की होड़ सी मच गई. सारी आलोचनाओं के बावजूद नीतीश कुमार ने भी फ्री बीज- कुल मिलाकर कहें, तो 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' और नकद सहायता का रास्ता पकड़ लिया. 2025 के चुनाव से पहले जीविका दीदियों को दस-दस हजार रुपये की राशि बांटने को लेकर उनकी अपनी पार्टी के अंदर दबी जुबान में विरोध हुआ. जेडीयू के ही कुछ पुराने नेताओं का मानना है कि पार्टी अब अपने मूल समाजवादी सिद्धांतों से भटककर चुनावी रेवड़ियों के सहारे टिकना चाहती है. खासतौर पर प्रशांत किशोर ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया. तेजस्वी इसी वजह से वर्तमान सरकार को तंत्र- मंत्र की सरकार बताने लगे.
3 C से समझौता नहीं-
नीतीश कुमार हमेशा गर्व से कहते थे कि वे 'थ्री सी' यानी क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म से कभी समझौता नहीं करेंगे. शुरुआती सालों में उन्होंने 'स्पीडी ट्रायल' के जरिए खूंखार अपराधियों को जेल भिजवाया, जिससे आम आदमी का पुलिस पर भरोसा बढ़ा. लेकिन बाद के वर्षों में अनंत सिंह के आवास पर पत्रकार को बंधक बनाने की घटना हो या ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद पटना की सड़कों पर आगजनी हुई. इन घटनाओं ने सुशासन के इकबाल पर सवाल खड़े कर दिए. सुशासन बाबू- नीतीश कुमार एक और चीज जिस पर चाहकर भी लगाम नहीं लगा सके भ्रष्टाचार. आलम ये है कि आज बिना सुविधा शुल्क के सरकारी दफ्तरों में फाइलें नहीं सरकतीं. 'जानकारी कॉल सेंटर' और 'जनता के दरबार में मुख्यमंत्री' जैसे पारदर्शी कार्यक्रम, जो बड़े उत्साह के साथ शुरू हुए थे, समय के साथ नौकरशाही की भेंट चढ़ गए. भूमि सुधार की रिपोर्टें धूल फांकने वाली स्थिति में है और कॉमन स्कूल सिस्टम का सपना आज भी अधूरा है. शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर शिक्षकों की बहाली तो हुई, लेकिन गुणवत्ता को लेकर सवाल आज भी बरकरार हैं. स्वास्थ्य केंद्रों की इमारतें तो बन गईं, लेकिन उनमें डॉक्टरों और आधुनिक सुविधाओं की कमी ने नीतीश के विकास मॉडल को कटघरे में खड़ा किया है.
यू-टर्न से साख को नुकसान-
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी राजनीतिक त्रासदी उनका वैचारिक रूप से अस्थिर होना रही. 2010 की प्रचंड जीत के बाद उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा किया. 2013 में बीजेपी से नाता तोड़ना, 2015 में आरजेडी के साथ 'महागठबंधन' बनाना, फिर 2017 में वापस बीजेपी के पास जाना और फिर 2022 में फिर से यू-टर्न लेना- इन सबने उनकी साख को भारी नुकसान पहुंचाया. राजनीति को समझने वाला तबका चर्चा में ये जरूर कहता है- अपनी सत्ता बचाने के लिए उन्होंने बार-बार जनादेश का अपमान किया. इसी वजह से उन पर मीम्स बने और उन्हें पलटूराम तक का टैग दिया गया. कभी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए दिल्ली की सत्ता को चुनौती देने वाले नीतीश, आज विशेष पैकेज पर मान जाने को मजबूर हैं. यह उनके राजनीतिक कद के सिमटने का संकेत रहा. आज का पूरा दिन उनके चेहरे पर एक उदास भाव दिखा. हालांकि, सम्राट को माला पहनाते वक्त थोड़े उत्साहित रहे लेकिन कैबिनेट की बैठक से निकलते वक्त चेहरे का भाव भावुक कर देने वाला था. उन्होंने आस-पास के लोगों के चेहरे पढ़े. अपने छूट जाने वाले स्थान का कमोवेश अवलोकन भी किया. उसके बाद कार में बैठ गए.
उम्र के 75वें पड़ाव पर पहुंचे नीतीश कुमार अपनी इच्छा पूर्ति के लिए राज्यसभा के सांसद बने हैं. अब उनके पीछे उन्हीं के बेटे का नाम गूंजने लगा है. निशांत कुमार. शायद वो यही चाहते थे. वर्तमान में जब निशांत वीरचंद पटेल स्थित जेडीयू कार्यालय आते हैं, तो कार्यकर्ताओं में एक अजीब सी हलचल होती है. मौसम में गर्माहट लेकिन जेडीयू कार्यालय में निशांत का आना जेडीयू कार्यकर्ताओं के मन को शीतल कर जाता है. लेकिन सियासी गलियारों में सवाल अभी से खड़े हैं. क्या वे 'दूसरे नीतीश' बन पाएंगे? नीतीश के करीबी रहे नेता दबी जुबान में कहते हैं, जो योग्यता और धैर्य, प्रशासनिक मशीनरी को संभालने का अंदाज, बिहार के जातिगत समीकरण को हैंडल करने की योग्यता, नीतीश कुमार में रही. आज भी बिहार के किसी नेता में नहीं है. नीतीश कुमार का इस्तीफा एक युग का अंत है. उन्होंने टाइपराइटर वाले बिहार को टैबलेट वाले बिहार में बदला, लालटेन को बिजली दी और गांवों को पक्की सड़कों से जोड़ा. लेकिन उनके दो दशकों के राज के बाद भी पलायन, बेरोजगारी और उद्योग जैसे बुनियादी सवाल आज भी बिहार की आंखों में आंखें डालकर खड़े हैं.
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