10 साल बाद खाया चावल का दाना, बंगाल के बीजेपी कार्यकर्ता ने अपमान के बाद ली थी अनोखी कसम

पश्चिम बंगाल से एक अनोखी कहानी सामने आई है. यहां एक बीजेपी कार्यकर्ता सुभाष बर्मन ने 10 साल के लंबे इंतजार के बाद रविवार को पहली बार चावल खाया. कारण जान कर रह जाएंगे हैरान.

अनोखी कसम
gnttv.com
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  • 11 मई 2026,
  • अपडेटेड 10:33 AM IST

पश्चिम बंगाल के सीतलकुची ब्लॉक से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने लोगों को भावुक कर दिया. यहां बीजेपी कार्यकर्ता सुभाष बर्मन ने करीब 10 साल बाद रविवार को पहली बार चावल खाया. यह सिर्फ एक आम घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐसी कसम टूटने का पल था, जिसे उन्होंने सालों पहले एक दर्दनाक घटना के बाद लिया था.

2016 की घटना ने बदल दी जिंदगी
मामला 2016 के कूचबिहार लोकसभा उपचुनाव से जुड़ा है. उस समय सुभाष बर्मन बीजेपी के पोलिंग एजेंट के तौर पर काम कर रहे थे. चुनाव खत्म होने के बाद, स्थानीय लोगों के मुताबिक, उनके घर पर कथित तौर पर सत्तारूढ़ टीएमसी समर्थकों ने हमला कर दिया था.

आरोप है कि घर में तोड़फोड़ और लूटपाट की गई. इतना ही नहीं, रसोई में बना खाना भी फेंक दिया गया और चावल से भरे बर्तन पलट दिए गए. इस घटना ने सुभाष बर्मन को अंदर तक झकझोर दिया.

अपमान के बाद खाई थी कसम
बताया जाता है कि इस घटना के बाद सुभाष बर्मन ने एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने कसम खाई कि जब तक पश्चिम बंगाल में बीजेपी सत्ता में नहीं आएगी, तब तक वह चावल को हाथ तक नहीं लगाएंगे. करीब 10 साल तक उन्होंने अपनी इस प्रतिज्ञा को निभाया. चावल जैसे रोजमर्रा के भोजन से दूरी बनाए रखना उनके लिए सिर्फ खान-पान का मामला नहीं था, बल्कि यह उनके विरोध और दर्द का प्रतीक बन गया था.

गांव वालों के बीच तोड़ी प्रतिज्ञा
रविवार को भवईर्थाना ग्राम पंचायत के अवाली कुरा बूथ इलाके में एक खास माहौल देखने को मिला. गांव के लोग, रिश्तेदार और पार्टी से जुड़े लोग वहां जुटे, जहां सुभाष बर्मन ने आखिरकार अपनी कसम तोड़ी और चावल खाया. कई लोगों ने इसे एक भावुक पल बताया. यह सिर्फ खाना खाने का मौका नहीं था, बल्कि एक लंबे इंतजार और भावनात्मक सफर का अंत भी माना गया.

अब भी संभालकर रखे हैं टूटे बर्तन
स्थानीय जानकारी के मुताबिक, 2016 की घटना की यादें आज भी सुभाष बर्मन के साथ हैं. उनके घर का कुछ हिस्सा अब भी टूटा हुआ है. इतना ही नहीं, उन्होंने उस दिन टूटे बर्तनों को भी संभालकर रखा है, ताकि वह उस अपमान और संघर्ष को भूल न सकें.

सुभाष बर्मन का कहना है कि वह उस दिन के अपमान को कभी भूल नहीं पाए. उनके मुताबिक, उन्हें लगता है कि उनका सपना किसी हद तक पूरा हुआ है और अब वक्त आ गया था कि वह फिर से अपने लोगों के साथ बैठकर भोजन करें.

(रिपोर्ट- मंसूर हबीबुल्लाह)

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