छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में सामने आया कथित सर्पदंश मुआवजा घोटाला प्रदेश के सबसे बड़े राजस्व घोटालों में गिना जा रहा है. आरोप है कि 431 लोगों की फर्जी सर्पदंश मौतें दिखाकर करीब 17.24 करोड़ रुपये का सरकारी मुआवजा मंजूर कराया गया. मामले में अब तक 19 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी हैं.
विधानसभा के आंकड़ों से उठे सवाल
मामले ने तब तूल पकड़ा जब विधानसभा में सामने आए आंकड़ों में जशपुर जिले में पिछले तीन वर्षों में सर्पदंश से केवल 96 मौतें दर्ज होने की जानकारी मिली. वहीं, बिलासपुर में 431 मौतों के आधार पर मुआवजा प्रकरण तैयार किए जाने का आरोप सामने आया. इसी अंतर ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया.
डॉक्टर से लेकर बाबू और पुलिसकर्मी तक गिरफ्तार
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह के मुताबिक, अब तक 19 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है. इनमें डॉक्टर, राजस्व विभाग के कर्मचारी, एसडीएम कार्यालय के बाबू, तहसील कार्यालय के क्लर्क, पुलिस विभाग के दो कर्मचारी, एक वकील और एक जनप्रतिनिधि शामिल हैं. हाल ही में एसडीएम कार्यालय के बाबू नरेंद्र कौशिक, गरीब राम बिंझवार और तहसील कार्यालय के क्लर्क हरिशंकर राठौर को भी गिरफ्तार किया गया.
फर्जी दस्तावेजों के सहारे निकाला गया करोड़ों का मुआवजा
जांच में आरोप है कि फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पंचनामा, राजस्व अभिलेख और अन्य सरकारी दस्तावेज तैयार कर करोड़ों रुपये का मुआवजा निकाला गया. पुलिस अब उन लोगों की भूमिका भी खंगाल रही है, जिन्होंने दस्तावेज तैयार किए, सत्यापित किए और मुआवजा स्वीकृत कराया.
बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने इस मुद्दे को विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए उठाया था. इसके बाद सदन में इस पर तीखी बहस हुई. राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया. विधायक का कहना है कि यह केवल मुआवजा गड़बड़ी नहीं, बल्कि गहरी जड़ें जमाए भ्रष्टाचार का मामला है.
बड़े अधिकारियों पर भी जांच
जांच एजेंसियां अब बैंक खातों, मुआवजा स्वीकृति प्रक्रिया और सरकारी रिकॉर्ड की बारीकी से जांच कर रही हैं. सूत्रों के अनुसार कई वकील, जनप्रतिनिधि, कथित हितग्राही, पुलिस अधिकारी, तहसीलदार, पटवारी और राजस्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है.
रिपोर्ट-मनीष शरन
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