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कोई निजी संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन अदालत का दर्जा नहीं रखता- HC

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देते हुए कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली निजी संस्थाएं कानून से स्थापित अदालत नहीं हैं. वे धार्मिक राय दे सकती हैं, लेकिन उनकी राय किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या दायित्व को बाध्यकारी तरीके से नहीं बदल सकती.

Chhattisgarh High Court
मनीष शरण
  • रायपुर,
  • 08 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:37 PM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि कोई निजी धार्मिक संस्था या स्वयं को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून से स्थापित अदालत का दर्जा नहीं रखता. ऐसी संस्था किसी महिला या पुरुष की वैवाहिक स्थिति का न्यायिक निर्धारण नहीं कर सकती और न ही अपने आदेश से विवाह खत्म कर सकती है.

बच्चों को लेकर दूसरे पति से विवाद-
मामला रायपुर के टिकरापारा निवासी 38 वर्षीय निरोश अब्बासी से जुड़ा है. उनकी पहली शादी के पति की वर्ष 2015 में मृत्यु हो गई थी. इसके बाद 18 जुलाई 2020 को मोहम्मद आबिद खान से उनका विवाह हुआ. शादी के बाद बच्चों के नए परिवार में समायोजन को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हुआ.

पति ने तलाक का प्रोसेस शुरू किया-
महिला के मुताबिक विवाद के बाद पति ने तलाक देने की प्रक्रिया शुरू की. पति का दावा था कि उन्होंने तलाक-ए-हसन तीन चरणों में 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को संचार के माध्यम से घोषित किया था. वहीं, महिला ने पति और ससुराल पक्ष पर उत्पीड़न, क्रूरता और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए. वन स्टॉप सखी सेंटर में काउंसिलिंग के बावजूद विवाद नहीं सुलझा.

कोर्ट में पहुंचा मामला-
इसके बाद महिला ने 7 अक्टूबर 2021 को पुलिस अधीक्षक से शिकायत की. शिकायत के आधार पर 1 नवंबर 2021 को महिला थाना रायपुर में IPC की धारा 498-A और 34 के तहत FIR दर्ज हुई.

इसी बीच रायपुर की इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट ने 18 जनवरी 2022 को महिला को उसके पति से तलाकशुदा बताया. मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने इस आदेश को कानूनी अधिकार से रहित घोषित कर दिया.

कोई धार्मिक संस्था कोर्ट का दर्जा नहीं रखती- कोर्ट
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देते हुए कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली निजी संस्थाएं कानून से स्थापित अदालत नहीं हैं. वे धार्मिक राय दे सकती हैं, लेकिन उनकी राय किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या दायित्व को बाध्यकारी तरीके से नहीं बदल सकती.

हालांकि हाईकोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया. कोर्ट ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए इदारा-ए-शरिया के आदेश को निरस्त प्रभाव वाला माना और स्पष्ट किया कि विवाह विच्छेद अथवा वैवाहिक अधिकारों का कानूनी निर्धारण केवल सक्षम न्यायिक या वैधानिक प्रक्रिया से ही होगा.

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