रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर बढ़ते खर्च ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी है. ऐसे में चित्रकूट के कई किसान जैविक और प्राकृतिक खेती को कम लागत में बेहतर कमाई का जरिया बना रहे हैं. गोबर की खाद, जीवामृत, वर्मी कंपोस्ट और प्राकृतिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से किसान खेती का खर्च घटा रहे हैं. वहीं, जैविक उत्पादों की अच्छी मांग के चलते उन्हें फसल की बेहतर कीमत भी मिल रही है. जिले में कुछ किसान खुद जैविक खेती करने के साथ दूसरे किसानों को भी इसका प्रशिक्षण दे रहे हैं.
रिटायर्ड शिक्षक ने 2022 में शुरू की जैविक खेती
कर्वी तहसील के बैहार गांव के रहने वाले रिटायर्ड शिक्षक नत्थूराम ने साल 2022 में जैविक खेती शुरू की. उन्होंने कृषि विभाग के जरिए झांसी के चिरगांव राजकीय कृषि विद्यालय में तीन दिन का प्रशिक्षण लिया. इसके बाद उन्होंने खास तरीके से जीवामृत तैयार कर सबसे पहले मूली की खेती की. मुनाफा मिलने के बाद उन्होंने रबी और खरीफ की फसलें उगाना शुरू कर दिया.
नत्थूराम अब 18 बीघे में खेती के साथ फलदार पौधों की बागवानी भी कर रहे हैं. उनका दावा है कि इससे उन्हें सालाना 4 से 5 लाख रुपये का मुनाफा हो रहा है. खास बात यह है कि उनकी जैविक उपज खेत से ही बिक जाती है. उन्हें बाजार जाने की जरूरत नहीं पड़ती. वह किसानों को जीवामृत बनाना सिखाने के साथ इसे बेचते भी हैं. उनके साथ 11 गांवों के करीब 250 किसान जैविक खेती कर रहे हैं.
बीपी और शुगर की परेशानी के बाद जैविक खेती से जुड़े
मानिकपुर तहसील के बरहट गांव के किसान कोठारी सिंह पटेल ने सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद 2023 में जैविक खेती शुरू की. उनका कहना है कि वह शुगर और बीपी जैसी परेशानियों से जूझ रहे थे. जैविक खेती शुरू करने के बाद उन्होंने अपने खेत में उगाई जैविक उपज का सेवन करना शुरू किया. इसके बाद उनकी खेती में रुचि और बढ़ गई.
वह अब धान, अरहर और ज्वार जैसी फसलें उगा रहे हैं. खेती में जीवामृत और घन जीवामृत का इस्तेमाल करते हैं. उनका कहना है कि जैविक खेती में पैसे से ज्यादा मेहनत की जरूरत होती है. इससे परिवार के लिए सालभर का अनाज निकल आता है और अतिरिक्त उपज बाजार में बेच दी जाती है.
150 गायों से तैयार की खाद, बंजर जमीन को बनाया उपजाऊ
कर्वी तहसील के बेड़ी पुलिया के पास प्रगतिशील किसान योगेश जैन साल 2010 से प्राकृतिक और जैविक खेती कर रहे हैं. उनके मुताबिक, जिस जमीन पर उन्होंने खेती शुरू की थी, वह रासायनिक खेती के कारण काफी खराब हो चुकी थी. उन्होंने पहले पशुपालन शुरू किया और करीब 150 गायों की गौशाला बनाई. गोबर और गौमूत्र से खाद तैयार कर खेतों में इस्तेमाल किया गया. इससे जमीन की उर्वरता में सुधार हुआ. योगेश जैन के मुताबिक, प्राकृतिक खेती में जल संरक्षण, जमीन की सुरक्षा, वनीकरण, बागवानी और मसाला खेती पर ध्यान देना जरूरी है. वह करीब 50 किसानों का क्लस्टर बनाकर जैविक उपज को एक साथ बेचते हैं. उनका दावा है कि इससे उन्हें बाजार के मुकाबले बेहतर कीमत मिलती है और सालाना करीब 10 लाख रुपये का मुनाफा हो रहा है.
सरकार भी दे रही किसानों को प्रशिक्षण और अनुदान
कृषि उप निदेशक जीत लाल गुप्ता के मुताबिक, केंद्र और राज्य सरकार मिलकर नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग योजना चला रही हैं. साल 2026-27 में जिले में 25 क्लस्टर बनाने और 3125 किसानों को जैविक खेती से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है. किसानों को प्रशिक्षण के साथ 2 हजार रुपये का अनुदान भी दिया जा रहा है. उनके मुताबिक, शुरुआत में जैविक खेती में उत्पादन थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन लगातार देशी खाद के इस्तेमाल से जमीन की उर्वरता बढ़ती है और उत्पादन भी बेहतर होने लगता है. अपनी उपज खेत से बेच सकते हैं या एफपीओ, डिजिटल प्लेटफॉर्म और अन्य माध्यमों से बाजार तक पहुंचा सकते हैं.
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