इंडिया गठबंधन में शामिल पार्टियां और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) को पद से हटाने के लिए धरना-प्रदर्शन कर रही हैं. इसी लेकर सीजेपी ने 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने का ऐलान कर रखा है. हालांकि इस प्रदर्शन से पहले ही दिल्ली पुलिस ने सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके (Abhijeet Dipke) को हिरासत में ले लिया है. अभिजीत दिपके का कहना है कि चाहे कुछ भी हो जाए CEC ज्ञानेश कुमार को हटाकर दम लेंगे. उधर, राहुल गांधी ने भी X पर पोस्ट कर दावा किया कि ज्ञानेश कुमार अपने पद से जाएंगे. आइए जानते हैं कि आखिर मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने को लेकर क्या नियम हैं?
क्या लगाए हैं आरोप
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कॉकरोच जनता पार्टी, कांग्रेस सहित अन्य दलों का आरोप है कि वे सरकार के पक्ष में एकतरफा फैसले लेते हैं. ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के बाद से चुनाव आयोग अपनी स्वतंत्रता और संवैधानिक निष्ठा बनाए रखने में विफल रहा है. विपक्षी दलों ने वोटर लिस्ट में गड़बड़ी और 'वोट चोरी' के आरोप लगाए हैं. विपक्ष का आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में पात्र और वैध मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जिससे सत्तारूढ़ पार्टी को फायदा पहुंचता है. हालांकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और चुनाव आयोग ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है और विपक्ष पर सिर्फ राजनीति करने का आरोप लगाया है. आपको मालूम हो कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक है. उन्होंने 19 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार ग्रहण किया था.
कैसे होती है मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति
आपको मालूम हो कि चुनाव आयोग के पास स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी होती है. आयोग के तीन सदस्यों (एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्त) पर इसका जिम्मा होता है . संविधान के अनुच्छेद 324 और अभी हाल ही में पास हुए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम 2023 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्त की नियुक्ति के नियम तय किए गए हैं. राष्ट्रपति एक सेलेक्शन पैनल की सिफारिश पर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं. सेलेक्शन पैनल में तीन सदस्य होते हैं. इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और केंद्रीय कैबिनेट के एक मंत्री शामिल होते हैं. चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर शर्त ये है कि उस व्यक्ति ने भारत सरकार में सचिव स्तर के पद पर काम किया हो. व्यक्ति सत्यनिष्ठा वाला होना चाहिए और उसके पास चुनाव प्रबंधन का गहरा अनुभव होना चाहिए. मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या फिर 65 साल की आयु, जो भी पहले हो होता है. मुख्य चुनाव आयुक्त को वही वेतन, भत्ते और सुविधाएं मिलती हैं जो सुप्रीम कोर्ट के एक जज को दी जाती हैं.
मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है पद से
संविधान के अनुच्छेद 324 (5) में प्रावधान किया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से सिर्फ उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन तरीकों और आधारों पर सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है. यही बात 2023 के नए कानून की धारा 11(2) में भी लिखी गई है. उधर, बाकी के दो चुनाव आयुक्तों को हटाना हो तो सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर उन्हें हटाया जा सकता है. हमारे संविधान के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ दो गंभीर आधारों पर पद से हटाया जा सकता है. पहला यदि मुख्य चुनाव आयुक्त भ्रष्ट आचरण में शामिल हों व अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हों और दूसरा यदि शारीरिक या मानसिक रूप से अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हों.
महाभियोग की प्रक्रिया
1. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की ताकत सिर्फ हमारे देश की संसद के पास होती है. महाभियोग की प्रक्रिया के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जा सकता है. यदि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए लोकसभा में प्रस्ताव लाया जा रहा है तो उस प्रस्ताव पर कम से कम 100 सांसद और राज्यसभा के लिए कम से कम 50 सांसदों का दस्तखत होना जरूरी है. इस प्रस्ताव को राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के स्पीकर को सौंपा जाता है. सदन के अध्यक्ष प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं. प्रस्ताव स्वीकार होने पर मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे आरोपों की जांच के लिए जजों और विशेषज्ञों की एक तीन सदस्यीय कमेटी बनाई जाती है.
2. यदि कमेटी की जांच में मुख्य चुनाव आयुक्त को दोषी पाया जाता है तो फिर उस प्रस्ताव पर संसद के दोनों सदनों में चर्चा और बहस होती है. इसके बाद मतदान किया जाता है. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने को लेकर लाए गए प्रस्ताव को पास करने के लिए दोनों सदनों में अलग-अलग विशेष बहुमत की जरूरत होती है. वोटिंग के दिन सदन में मौजूद और वोट देने वाले सांसदों का दो-तिहाई बहुमत प्रस्ताव के पक्ष में होना चाहिए.
3. यदि दोनों सदनों यानी लोकसभा व राज्यसभा से प्रस्ताव दो-तिहाई बहुमत से पास हो जाता है तो इसे अंतिम मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और आदेश जारी होने के तुरंत बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को अपने पद से हटना पड़ता है. आपको मालूम हो कि आज तक किसी भी चुनाव आयुक्त को महाभियोग के जरिए नहीं हटाया गया है.