15 अगस्त से पहले बाजारों में तिरंगे की मांग बढ़ गई है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे हाथों तक पहुंचने वाला तिरंगा आखिर बनता कहां है? दिल्ली में एक ऐसी ही जगह है, जहां कपड़े के टुकड़ों को जोड़कर तैयार किया जाता है देश की आन, बान और शान... मजे की बात ये है कि यहां तिरंगा बनाने का काम तब शुरु हुआ था, जब चीन ने भारत पर हमला किया था.
दिल्ली के सदर बाजार में इसी तिरंगे को बनाने वाले अब्दुल गफ्फार को लोग प्यार से ‘फ्लैग अंकल’ कहते थे. लेकिन अब फ्लैग अंकल हमारे बीच नहीं हैं. गफ्फार के जाने के बाद उनके भाई अब्दुल मालिक ने तिरंगे का ये काम संभाला है. भाई की विरासत को आगे बढ़ाते मालिक की कहानी बताते हैं.
इस जगह को चलाते हैं अब्दुल मालिक-
ये दिल्ली का वो ठिकाना है, जहां इन दिनों दिन-रात तिरंगे तैयार किए जा रहे हैं. कहीं कपड़े की कटिंग हो रही है, कहीं सिलाई, तो कहीं तैयार तिरंगों की पैकिंग. आजादी के पर्व से पहले यहां काम की रफ्तार कई गुना बढ़ जाती है.
फैमिली मिलकर बनाती है तिरंगा-
इस काम में सिर्फ अब्दुल मालिक ही नहीं, उनके दामाद और भाई भी तिरंगा तैयार करने में लगे हैं. केसरिया, सफेद, हरा तीनों रंगों के कपड़े एक साथ आते हैं. फिर शुरू होती है इन्हें तिरंगे की शक्ल देने की प्रक्रिया. सबसे पहले कपड़े की कटिंग, फिर तीनों रंगों को सही अनुपात में जोड़ा जाता है और आखिर में बीच में अशोक चक्र लगाया जाता है.
तिरंगा बनाने के लिए मेहनत और बारीकी की जरूरत-
एक-एक तिरंगे को तैयार करने में मेहनत और बारीकी दोनों की जरूरत होती है. इस काम को करीब से देखें तो समझ आता है कि तिरंगा तैयार करना सिर्फ सिलाई का काम नहीं है. अब्दुल मालिक बताते हैं कि उनके बनाए झंडे देश-विदेश तक पहुंचते हैं. वो बताते हैं कि फ़्लैग अंकल जब जीवित थे तो हमें हर घर तिरंगा अभियान के तहत झंडे बनाने का भारी ऑर्डर मिला. हमने उस वक्त एक दिन में डेढ़ लाख से ज़्यादा तिरंगे तैयार किए थे.
सीपी के सेंट्रल पार्क का झंडा यहीं तैयार हुआ था-
इतना ही नहीं, अब्दुल मालिक बताते हैं कि एक बार राजनाथ सिंह ने उनसे कहा कि ऐसा झंडा बनाओ जैसा आजतक न बना हो. उस वक्त उन्होंने 60 बाई 90 फ़ीट का झंडा तैयार किया था. वो बताते हैं कि दरअसल ये किस्सा पाकिस्तान से जुड़ा हुआ था.
दुकान के मालिक अब्दुल मालिक बताते हैं कि 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे मौकों पर तिरंगे की मांग काफी बढ़ जाती है. इसके अलावा सीपी के सेंट्रल पार्क में भी जो झंडा लगा है, वो भी इन्हीं लोगों ने तैयार किया है.
तिरंगे की सिलाई करने वाले हाथों के लिए ये रोज का काम है. लेकिन सामने तैयार होकर निकलने वाला हर तिरंगा देश के किसी न किसी हिस्से में पहुंचकर आजादी के जश्न का हिस्सा बनता है. दुकान से निकलकर यही तिरंगे बाजारों, स्कूलों, दफ्तरों और घरों तक पहुंचेंगे. ये परिवार कहता है कि तीसरी पीढ़ी इस काम में लगी है और उम्मीद है कि आगे की पीढ़ियाँ भी इस काम में जुड़ेंगी.
ये भी पढ़ें: