Exclusive: दर्द को बदला जीत में! एसिड अटैक सरवाइवर चला रहीं ये कैफे, हर किरदार दिलाएगा मुसीबतों से लड़ने का जज्बा

Chhanv Foundation ने 2013 में 'स्टॉप एसिड अटैक्स' अभियान शुरू किया. इसके बाद 10 दिसंबर 2014 को पहला Sheroes Hangout शुरू हुआ. शुरुआत सिर्फ 5 लड़कियों के साथ हुई थी. उद्देश्य केवल नौकरी देना नहीं था, बल्कि ऐसा सुरक्षित स्थान बनाना था जहां सर्वाइवर्स खुलकर जी सकें, लोगों से घुल-मिल कर सकें और समाज को जागरूक कर सकें.

Acid attack survivors
यामिनी सिंह
  • नई दिल्ली,
  • 12 मई 2026,
  • अपडेटेड 5:53 PM IST

दिल्ली, लखनऊ, आगरा और नोएडा में चल रहे Chhanv Foundation के 'शीरोज हैंगआउट कैफे' केवल एक कैफे नहीं हैं, बल्कि उन महिलाओं की नई पहचान हैं जिन्हें कभी समाज ने 'बेचारी' कहकर किनारे कर दिया था. ये कैफे उन एसिड अटैक सर्वाइवर्स द्वारा चलाए जाते हैं जिन्होंने दर्द, तिरस्कार और संघर्ष को ताकत में बदल दिया.

भारत में एसिड अटैक केवल एक अपराध नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मसम्मान और स्वतंत्रता पर हमला है. ज्यादातर मामलों में वजह होती है शादी का प्रस्ताव ठुकराना, दोस्ती या रिश्ते से इनकार करना, दहेज विवाद, जमीन विवाद या पुरुष अहंकार. कई रिपोर्टों में सामने आया है कि बड़ी संख्या में एसिड हमले उन लड़कियों पर हुए जिन्होंने किसी की 'ना' स्वीकार नहीं करने वाली मानसिकता का विरोध किया. इस कड़ी में GNT Digital ने delhi में Acid attack survivors से बात की और उनकी कहानी सुनी.

काजल की कहानी
इन सर्वाइवर में से एक है झारखंड की रहने वाली 19 वर्षीय काजल की कहानी. जब वह 15 साल की थीं और 10वीं क्लास में पढ़ती थीं, तब एक लड़का उन्हें लगातार बात करने के लिए मजबूर करता था. काजल ने मना किया, लेकिन वह उनकी 'ना' स्वीकार नहीं कर पाया.
एक रात लगभग 12 बजे उस लड़के ने सोती हुई काजल पर एसिड फेंक दिया. इस हमले में उनकी मां भी गंभीर रूप से झुलस गईं. इसके बाद शुरू हुआ अस्पतालों के चक्कर लगाने का सिलसिला. कई जगह इलाज से मना कर दिया गया. दर्द इतना था कि कई बार काजल ने आत्महत्या तक के बारे में सोचा.

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी...

मीडिया दबाव के बाद उन्हें एयरलिफ्ट कर दिल्ली लाया गया, जहां All India Institute of Medical Sciences में इलाज हुआ. बाद में Chhanv Foundation ने उन्हें चिकित्सा, कानूनी सहायता और रोजगार उपलब्ध कराया. आज काजल जैसी कई लड़कियां दूसरों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं.

रूपा की कहानी
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की रहने वाली रूपा भी इन्हीं में एक हैं. 2008 में उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई जब उनकी सौतेली मां ने सोते समय उनके चेहरे पर तेजाब डाल दिया था. हालांकि, छांव फाउंडेशन (Chhanv Foundation) ने रूपा को रोजगार समेत चिकित्सा और कानूनी सहायता प्रदान की.


शीरोज हैंगआउट
Chhanv Foundation ने 2013 में 'स्टॉप एसिड अटैक्स' अभियान शुरू किया. इसके बाद 10 दिसंबर 2014 को पहला Sheroes Hangout शुरू हुआ. शुरुआत सिर्फ 5 लड़कियों के साथ हुई थी. उद्देश्य केवल नौकरी देना नहीं था, बल्कि ऐसा सुरक्षित स्थान बनाना था जहां सर्वाइवर्स खुलकर जी सकें, लोगों से घुल-मिल कर सकें और समाज को जागरूक कर सकें.

आज आगरा, लखनऊ और नोएडा समेत कई जगहों पर यह पहल फैल चुकी है और दर्जनों महिलाएं इससे जुड़कर आत्मनिर्भर बनी हैं. यहां काम करने वाली महिलाएं सिर्फ कॉफी नहीं परोसतीं, बल्कि लोगों को यह संदेश देती हैं कि सुंदरता चेहरे में नहीं, आत्मविश्वास में होती है. कैफे में आने वाले लोग इन महिलाओं से बातचीत करते हैं, उनकी कहानियां सुनते हैं और समझते हैं कि एसिड हमला केवल शरीर नहीं जलाता, बल्कि किसी की पूरी जिंदगी बदल देता है. यही वजह है कि शीरोज हैंगआउट आज सामाजिक बदलाव का प्रतीक बन चुका है.


आखिर क्यों होते हैं एसिड अटैक?
भारत में एसिड अटैक के पीछे सबसे बड़ा कारण 'न'. जब कोई लड़की शादी, दोस्ती या प्रेम प्रस्ताव ठुकरा देती है तो कई पुरुष इसे अपने अहंकार पर चोट मान लेते हैं.



रिपोर्ट्स बताती हैं कि:
लगभग 78% मामलों में वजह शादी या रिश्ते से इनकार होती है.
कई मामले दहेज विवाद से जुड़े होते हैं.
जमीन, व्यापार और पारिवारिक दुश्मनी भी कारण बनते हैं.
कई बार आरोपी परिचित या करीबी लोग ही होते हैं.
यह मानसिकता बताती है कि समाज का एक हिस्सा अब भी महिलाओं को 'अपनी संपत्ति' समझता है. जब महिला अपनी पसंद से फैसला लेती है, तब हिंसा का सहारा लिया जाता है.


एसिड अटैक को लेकर क्या कानून हैं?
भारत में 2013 के बाद एसिड अटैक को लेकर कानून सख्त किए गए. सुप्रीम कोर्ट ने एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगाने और पीड़ितों को मुआवजा देने के निर्देश दिए. लेकिन आज भी कई जगह बिना पहचान पत्र के एसिड मिल जाता है. एसिड अटैक रोकने के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं हैं. समाज की सोच बदलनी होगी. बच्चों को बचपन से सिखाना होगा कि 'ना' का मतलब 'ना' होता है और महिलाओं को अपनी पसंद और निर्णय का अधिकार है.

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