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National Handloom Day: ग्रामीण पर्यटन से सशक्त हो रहे हैंडलूम गांव, महिला बुनकरों को मिल रहे आय और पहचान के नए अवसर

उत्तर प्रदेश के पांच जिलों में, जहां प्रमुख 'हैंडलूम विलेज' स्थित हैं, वहां मई से जुलाई के बीच पर्यटकों की संयुक्त संख्या में लगभग 36 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. हैंडलूम के चलते महिलाओं को आय के नए अवसर भी मिल रहे हैं. साथ ही उनकी पहचान भी बढ़ रही है.

Handloom In UP
समर्थ श्रीवास्तव
  • लखनऊ,
  • 07 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 7:58 PM IST

उत्तर प्रदेश में ग्रामीण पर्यटन अब केवल प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक 'हैंडलूम विलेज' को भी पर्यटन का अहम हिस्सा बनाया जा रहा है. राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर सामने आए आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग की एग्री रूरल और गंगा ग्राम रूरल टूरिज्म परियोजनाओं के तहत 'हैंडलूम विलेज' को पर्यटन से जोड़ने की पहल का सकारात्मक असर दिखने लगा है. इस मॉडल से जुड़ी महिला बुनकरों और कारीगरों की औसत आय में करीब 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि कुछ प्रमुख हैंडलूम क्लस्टरों में 70 प्रतिशत से अधिक बुनाई का कार्य महिलाएं संभाल रही हैं.

पर्यटन विभाग ने औरैया, वाराणसी, बांदा, चित्रकूट, लखीमपुर खीरी और बागपत के पारंपरिक 'हैंडलूम विलेज'को ऐसे पर्यटन अनुभव के रूप में विकसित करना शुरू किया है, जहां पर्यटक केवल हस्तनिर्मित उत्पाद खरीदते ही नहीं, बल्कि लाइव हैंडलूम बुनाई देखते हैं, बुनकरों से संवाद करते हैं, गांवों का भ्रमण करते हैं और स्थानीय संस्कृति को करीब से महसूस करते हैं. इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम होने के साथ बुनकरों को सीधे ग्राहक मिलने लगे हैं.

पर्यटन बढ़ने से 'हैंडलूम विलेज' तक पहुंचा बाजार

वाराणसी, चित्रकूट, बांदा, औरैया और बागपत जैसे पांच जिलों में, जहां प्रमुख 'हैंडलूम विलेज' स्थित हैं, मई से जुलाई के बीच पर्यटकों की संयुक्त संख्या में लगभग 36 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. सबसे अधिक वृद्धि औरैया में लगभग 90 प्रतिशत, बांदा में करीब 49 प्रतिशत, वाराणसी में 36 प्रतिशत, चित्रकूट में 30 प्रतिशत और बागपत में 10 प्रतिशत से अधिक रही. अब विभाग की रणनीति इन स्थापित पर्यटन स्थलों पर आने वाले पर्यटकों को आसपास के हैंडलूम गांवों और बुनकर बस्तियों तक ले जाने की है, ताकि पर्यटन का आर्थिक लाभ सीधे ग्रामीण कारीगरों तक पहुंचे.

'हैंडलूम विलेज' में मिलेगा असली शिल्प अनुभव

योजना के तहत वाराणसी आने वाले पर्यटकों को हिरामपुर के बुनकरों से जोड़ा जा रहा है. चित्रकूट की धार्मिक यात्रा के साथ रासिन गांव का हैंडलूम और हस्तशिल्प अनुभव जोड़ा जा रहा है, जबकि बांदा और बुंदेलखंड आने वाले पर्यटक कनवारा, कालिंजर और मिरतला जैसे गांवों में पारंपरिक बुनाई, बुनकरों के जीवन और स्थानीय उत्पादों को करीब से देख सकेंगे. इसी तरह लखीमपुर खीरी के परसिया, गोबरौला और बैंकटी गांवों को दुधवा क्षेत्र के ईको-टूरिज्म और थारू सांस्कृतिक अनुभव से जोड़ने की तैयारी है.

महिलाएं बनीं बदलाव की सबसे बड़ी ताकत

इस पहल का सबसे बड़ा लाभ महिला स्वयं सहायता समूहों और महिला बुनकरों को मिला है. पहले जहां अधिकांश महिलाएं केवल घरेलू स्तर पर उत्पादन तक सीमित थीं, वहीं अब वे डिजाइन, गुणवत्ता, मूल्य निर्धारण, ग्राहक संवाद और प्रत्यक्ष बिक्री जैसी गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं. प्रशिक्षण, डिजाइन विकास, बाजार से जुड़ाव और व्यावसायिक क्षमता निर्माण ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में नई गति दी है. 

लखीमपुर खीरी की नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित आरती राणा जैसी महिला कारीगर इस बदलाव की मिसाल बनकर उभरी हैं. उनके प्रयासों से थारू हस्तशिल्प को दुधवा आने वाले पर्यटकों तक पहुंचाने में मदद मिली है. वहीं मास्टर बुनकर छिद्दो देवी जैसी महिलाएं नई पीढ़ी को इस पारंपरिक बुनाई कला से जोड़ने का कार्य कर रही हैं.

पर्यटक सीधे बुनकरों तक पहुंचेः मंत्री

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश में ग्रामीण पर्यटन को स्थानीय हैंडलूम, हस्तशिल्प और महिला सशक्तिकरण से जोड़कर आत्मनिर्भर गांवों की मजबूत नींव तैयार की जा रही है. उन्होंने कहा कि जब पर्यटक सीधे बुनकरों तक पहुंचते हैं, तो महिलाओं को आय, पहचान और नए बाजार मिलते हैं, साथ ही प्रदेश की समृद्ध हस्तकरघा परंपरा को भी नई पहचान मिलती है. 

अपर मुख्य सचिव, पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य अमृत अभिजात* ने कहा कि विभाग का उद्देश्य स्थापित पर्यटन स्थलों पर आने वाले पर्यटकों को आसपास के हैंडलूम गांवों से जोड़ना है, ताकि साड़ी, गमछा, दरी, स्टोल और अन्य हस्तनिर्मित उत्पादों की सीधी खरीद के माध्यम से बुनकरों को बेहतर बाजार उपलब्ध हो सके. उन्होंने कहा कि यह मॉडल पर्यटन, स्थानीय शिल्प और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक साथ मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर उत्तर प्रदेश का यह मॉडल बताता है कि यदि पर्यटन को स्थानीय हैंडलूम, शिल्प, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाए, तो यह केवल पर्यटन उद्योग ही नहीं, बल्कि गांवों की आजीविका, महिला सशक्तिकरण और पारंपरिक बुनाई कला के संरक्षण का भी मजबूत माध्यम बन सकता है.

 

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