सौराष्ट्र में जन्माष्टमी का मिनी वेकेशन पूरा होते ही अब गणेशोत्सव की तैयारियां शुरू हो गई है. सौराष्ट्र की राजधानी माने जाने वाले राजकोट में इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं का निर्माण जोरों पर चल रहा है. पश्चिम बंगाल के कोलकाता से पिछले 30 वर्षों से लगातार राजकोट आकर मूर्तियां बनाने वाले मूर्तिकार दीपक जाना और उनकी 25 कारीगरों की टीम पूरी तरह से इको फ्रेंडली मिट्टी की मूर्तियां बना रही है.
इस बार मूर्तिकार दीपक जाना के सामने एक परेशानी आ खड़ी हुई है. इस वर्ष महंगाई की भारी मार मूर्तिकारों पर पड़ी है. सरकारी नियमों और अनुमतियों के कारण मिट्टी की किल्लत देखने को मिल रही है. पहले 3500 रुपए प्रति टन मिलने वाली मिट्टी अब जीएसटी और अन्य खर्चों के साथ सीधे 10 हजार रुपए प्रति टन तक पहुंच गई है.
इसके अलावा, सूरत और मुंबई में भारी बारिश व बाढ़ के कारण मूर्तियों के निर्माण में उपयोग होने वाली धान की घास (पुआल) और रस्सी-सुतली की कीमतें भी तीन से चार गुना बढ़ गई हैं.
मूर्तिकार दीपक कहते हैं कि हम कोलकाता की वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार सिर्फ और सिर्फ मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से ही मूर्तियां बनाते हैं. हम प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते. लेकिन सरकार के दिशा-निर्देशों और नियमों के अनुसार 8 से 9 फीट तक की ही मूर्तियां तैयार की जा रही हैं, जिनमें नवदुर्गा की गोद में बैठे गणपति बप्पा सहित इंटरनेट पर आधारित कई नए और आधुनिक डिज़ाइन लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं.
कच्चे माल की कीमतों में तीन से चार गुना बढ़ोतरी होने के बावजूद, ग्राहकों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए मूर्तियों के दामों में केवल 10 से 20 प्रतिशत तक की ही बढ़ोतरी की गई है. जन्माष्टमी की छुट्टियां समाप्त होने के बाद अब गणेश मंडल और श्रद्धालु मूर्तियों की बुकिंग व डिलीवरी के लिए भारी उत्साह के साथ उमड़ेंगे. ऐसे में कारीगरों को उम्मीद है कि राजकोट में लास्ट मोमेंट में भी काफी ज्यादा मात्रा में गणेश मूर्तिओ की खरीदी की जाएगी.