देशभर में जहां दशहरे पर रावण दहन के साथ त्योहार का समापन हो जाता है, वहीं हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में इसी दिन एक अनोखे उत्सव की शुरुआत होती है. यहां सात दिनों तक चलने वाले अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे में आस्था, सदियों पुरानी परंपराओं और संस्कृति की खास झलक देखने को मिलती है. इस साल 21 से 27 अक्टूबर तक आयोजित होने वाले इस उत्सव में रिकॉर्ड 347 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया है. यह संख्या पहले से दर्ज 284 देवी-देवताओं से 63 ज्यादा है. ऐसे में कुल्लू दशहरा एक बार फिर अपनी अनूठी परंपरा और भव्य आयोजन को लेकर चर्चा में है.
विजयादशमी के बाद क्यों शुरू होता है कुल्लू दशहरा?
कुल्लू दशहरे का इतिहास 16वीं सदी से जुड़ा है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इसकी शुरुआत राजा जगत सिंह के शासनकाल में हुई थी. राजा जगत सिंह ने 1637 से 1662 तक कुल्लू पर शासन किया था. कहा जाता है कि उन्होंने एक ब्राह्मण के श्राप से मुक्ति पाने के लिए अयोध्या से भगवान रघुनाथ की मूर्ति लाकर कुल्लू के सुल्तानपुर में स्थापित की थी. इसके बाद राजा ने भगवान रघुनाथ को अपने राज्य का प्रमुख देवता मान लिया और अपना शासन भी उनके नाम पर चलाने लगे. तभी से कुल्लू दशहरे में भगवान रघुनाथ की विशेष भूमिका रही है. देश के दूसरे हिस्सों में विजयादशमी पर उत्सव समाप्त होता है, लेकिन कुल्लू में इसी दिन से सात दिवसीय आयोजन शुरू होता है.
पालकियों में सजकर पहुंचते हैं देवी-देवता
कुल्लू दशहरे की सबसे खास बात यहां के स्थानीय देवी-देवताओं का जमावड़ा है. इन्हें जीवंत देवता माना जाता है. पारंपरिक रूप से सजी विशाल पालकियों और रथों में बैठाकर देवी-देवताओं को ढालपुर मैदान लाया जाता है. इस दौरान ढोल-नगाड़ों, तुरहियों और भक्तों की मौजूदगी से पूरा इलाका भक्तिमय हो जाता है. मनाली, बंजार, आनी, निरमंड, सैंज, गड़सा और मणिकर्ण समेत कुल्लू घाटी के अलग-अलग क्षेत्रों से देवी-देवता यहां पहुंचते हैं. परंपरा के मुताबिक, वे सुल्तानपुर पैलेस भी जाते हैं, जिसे रूपी पैलेस के नाम से भी जाना जाता है. यहां वे कुल्लू के पूर्व शाही परिवार से मिलते हैं.
284 से बढ़कर 347 हुई देवी-देवताओं की संख्या
कुल्लू घाटी के राजस्व रिकॉर्ड 'वाजिब-उल-अर्ज' में पहले 284 देवी-देवताओं के नाम दर्ज थे. इस रिकॉर्ड में उन देवताओं के नाम शामिल हैं, जिनके नाम पर जमीन है. हालांकि, इस साल आयोजन समिति ने 347 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया है. कुल्लू दशहरा समिति के अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक सुंदर सिंह ठाकुर के मुताबिक, समय के साथ स्थानीय देवी-देवताओं के अनुयायियों की संख्या बढ़ी है. देवताओं को स्थानीय स्तर पर मिलने वाली मान्यता में उनके अनुयायियों की संख्या भी मायने रखती है. कुल्लू देवी-देवता कारदार संघ स्थानीय देवताओं को मान्यता देने के लिए प्रशासन को सिफारिश करता है. इस तरह कुल्लू दशहरा सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत और सदियों पुरानी परंपराओं को जीवित रखने का भी बड़ा माध्यम है.
ये भी पढ़ें: