नवरात्रि का पर्व करीब आते ही झांसी में मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम तेज हो गया है. शहर के फूटा चौपड़ा स्थित कालीबाड़ी क्षेत्र में इन दिनों मिट्टी, रंग और शिल्पकारी के बीच एक ऐसी कहानी आकार ले रही है, जो झांसी की सांस्कृतिक पहचान और गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत तस्वीर सामने लाती हैं. यहां मुस्लिम शिल्पकार अब्दुल खलील अपने हाथों से मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं. उनके हाथों में थमी मिट्टी धीरे-धीरे देवी के स्वरूप में ढलती है और कुछ ही समय में चेहरे पर मुस्कान, आंखों में भाव और प्रतिमा में जीवंतता दिखाई देने लगती है.
अब्दुल खलील के लिए मूर्ति बनाना महज रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि परिवार से मिली एक ऐसी विरासत है, जिसे वह पिछले करीब ढाई दशक से आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने महज 13 साल की उम्र में अपने पिता अब्दुल खालिद के साथ रहकर मूर्तियां बनाने की बारीकियां सीखनी शुरू कर दी थीं. पिता करीब 45 वर्षों तक देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करते रहे. घर में मूर्तियां बनते देख खलील का भी इस कला के प्रति लगाव बढ़ता गया और धीरे-धीरे मिट्टी को आकार देने का हुनर उनकी पहचान बन गया.
खलील बताते हैं कि उन्होंने मूर्तिकला का प्रशिक्षण किसी संस्थान से नहीं लिया. उनके लिए पिता ही गुरु थे और घर ही उनकी पहली कार्यशाला. मिट्टी तैयार करने से लेकर प्रतिमा का ढांचा खड़ा करने, चेहरे के भाव उकेरने, रंग भरने और अंतिम सजावट तक की बारीकियां उन्होंने पिता के साथ काम करते हुए सीखीं. वर्ष 2012 में पिता के निधन के बाद उन्होंने इस परंपरा को अपने स्तर पर लगातार आगे बढ़ाया.
प्रमुख पंडालों के लिए तैयार करते हैं प्रतिमाएं
अब्दुल खलील के हाथों तैयार होने वाली प्रतिमाओं की मांग झांसी में लंबे समय से बनी हुई है. वह शहर के कई प्रमुख और प्रतिष्ठित स्थानों के लिए मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार करते हैं. इनमें कालीबाड़ी, दयासागर कंपाउंड, इलाइट चौराहा, बड़ा बाजार, बड़ा मठ सहित कई स्थान शामिल हैं.
खलील के अनुसार, बंगाली समाज कालीबाड़ी की करीब 168 वर्ष पुरानी परंपरा से जुड़ी दुर्गा प्रतिमा तैयार करने का अवसर भी उन्हें मिलता है. वर्षों से देवी प्रतिमाओं का निर्माण करते आ रहे खलील के लिए यह काम केवल एक ऑर्डर पूरा करना नहीं, बल्कि उस भरोसे को कायम रखना भी है, जो लोगों ने उनके हुनर पर जताया है.
मिट्टी से आकार, प्राकृतिक रंगों से सजावट
अब्दुल खलील प्रतिमाओं के निर्माण में मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं. उनका प्रयास रहता है कि प्रतिमाओं में प्राकृतिक सामग्री और बिना केमिकल वाले रंगों का अधिक से अधिक इस्तेमाल न किया जाए. उनका कहना है कि प्रतिमा तैयार करते समय वह उसके स्वरूप के साथ-साथ पर्यावरण का भी ध्यान रखते हैं, ताकि विसर्जन के बाद पानी और आसपास के वातावरण पर कम से कम प्रभाव पड़े. प्रतिमा के चेहरे को जीवंत बनाना उनके काम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. आंखों की बनावट, चेहरे की मुस्कान और भाव-भंगिमा पर वह विशेष ध्यान देते हैं. यही वजह है कि प्रतिमा पूरी होने के बाद उसमें एक अलग तरह की जीवंतता दिखाई देती है.
कीमत तय नहीं करते, श्रद्धा से स्वीकार करते हैं मेहनताना
खलील बताते हैं कि वह मूर्तियां बनाने के लिए हमेशा कोई निश्चित कीमत तय नहीं करते. प्रतिमा तैयार होने के बाद लोग अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार जो राशि देते हैं, उसे वह स्वीकार कर लेते हैं. उनके लिए यह काम पिता से मिली शिक्षा और वर्षों से लोगों के मिले विश्वास से जुड़ा हुआ है. वह बताते हैं कि मूर्ति निर्माण के दौरान उनके परिवार को बंगाली समाज और अन्य लोगों का भी लगातार सहयोग और स्नेह मिलता रहा है. उनके पिता ने भी अपने गुरु से यह कला सीखी थी. पिता को काम करते देखकर ही उन्होंने बचपन में इस हुनर को अपनाया और आज उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
धर्म अलग, लेकिन कला और सम्मान का रिश्ता एक
अब्दुल खलील मुस्लिम समुदाय से आते हैं, लेकिन वर्षों से उनके हाथों मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार होती रही हैं. वह बताते हैं कि इस काम को लेकर उन्हें समाज की ओर से कभी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा. इसके उलट लोगों ने उन्हें हमेशा सम्मान और सहयोग दिया. उनके हाथों तैयार प्रतिमाएं नवरात्रि में पंडालों में स्थापित होती हैं और श्रद्धालु नौ दिनों तक विधि-विधान से उनकी पूजा करते हैं. खलील के लिए यह बात उनके काम के प्रति लोगों के भरोसे को दर्शाती है. झांसी की यही तस्वीर उस सामाजिक ताने-बाने को सामने लाती है, जहां अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग एक-दूसरे की परंपराओं और हुनर का सम्मान करते हैं. अब्दुल खलील की कहानी इसी मेलजोल की एक मिसाल बनकर सामने आती है.
पिता की विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश
करीब 26 वर्षों से मूर्तियां बना रहे अब्दुल खलील आज अपने पिता की उस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसकी शुरुआत उनके परिवार में कई दशक पहले हुई थी. उनके लिए हर प्रतिमा के पीछे केवल मिट्टी और रंग नहीं, बल्कि वर्षों का अनुभव, मेहनत और पिता से मिली सीख जुड़ी है. नवरात्रि के दिनों में जब इन्हीं प्रतिमाओं के सामने हजारों श्रद्धालु सिर झुकाते हैं, तब शायद कम ही लोग जानते हैं कि उस प्रतिमा को आकार देने वाले हाथ किस कहानी से होकर यहां तक पहुंचे हैं.
अब्दुल खलील की कहानी इस मायने में खास है कि यहां हुनर ने धर्म की सीमाओं से आगे जाकर लोगों को जोड़ा है. पिता से मिली कला को उन्होंने अपने जीवन का हिस्सा बनाया और आज उसी कला के जरिए झांसी की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में अपनी भूमिका निभा रहे हैं. मिट्टी से तैयार होती मां दुर्गा की ये प्रतिमाएं उनके लिए सिर्फ शिल्प नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे भरोसे, मेहनत और आपसी सम्मान की पहचान भी हैं.
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