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यूपी के दो पत्रकारों को रिहाई देने में कोर्ट ने लगाए 34 साल, इनमें से एक का 2018 में हो गया था निधन

यूपी के दो पत्रकार राकेश गर्ग और राकेश गोयल को एक दीवानी अदालत ने 34 साल बाद रिहाई दे दी है. दोनों पत्रकार सहारनपुर में एक हिंदी दैनिक में काम करते थे. उन पर दंगा करने को लेकर आरोप दर्ज था, जिसके 34 साल बाद अदालत ने उन्हें छुट्टी दे दी.

UP journalist diacharged after 34 years
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 19 नवंबर 2021,
  • अपडेटेड 9:29 AM IST
  • जुलूस के दौरान लगाए थे भड़काऊ नारे
  • हलफनामे में त्रुटियों की वजह से हुई देर 

यूपी के मेरठ के रहने वाले दो पत्रकार राकेश गर्ग और राकेश गोयल को एक दीवानी अदालत ने 34 साल बाद रिहाई दे दी है. दोनों पत्रकार सहारनपुर में एक हिंदी दैनिक में काम करते थे. उन पर दंगा करने को लेकर आरोप दर्ज था, जिसके 34 साल बाद अदालत ने उन्हें छुट्टी दे दी.

इनमें से एक व्यक्ति राकेश गोयल का लंबी बीमारी के बाद 2018 में निधन हो गया था, जबकि राकेश गर्ग इस समय 64 वर्ष के हैं. अदालत ने कहा कि प्राचीन मामले में दो आरोपियों को बरी करने से जनहित को नुकसान नहीं पहुंचता है. साल 1991 में यूपी सरकार ने सपा के सीएम मुलायम सिंह यादव के तहत पहले ही अदालत से एक हलफनामे के माध्यम से आरोपी के खिलाफ सभी आरोपों को वापस लेने के लिए कहा था. 

हलफनामे में त्रुटियों की वजह से हुई देर 
सहारनपुर कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सरकार ने मार्च 1991 में मामले को वापस लेने के लिए कार्यवाही शुरू की थी, लेकिन हलफनामे में कुछ तकनीकी त्रुटियां होने की वजह से इसे वापस नहीं लिया जा सका. अदालत ने सरकार से संशोधित हलफनामा मिलने के 11 साल बाद 2002 में आरोपी को रिहा करने की कार्यवाही शुरू की. इसके बाद अगले 19 साल तक कार्यवाही चलती रही और आरोपी कोर्ट के चक्कर लगाते रहे.

राकेश गोयल और राकेश गर्ग के वकील और स्थानीय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अभय सैनी ने कहा, "अदालत को दोनों को बरी करने और इस नतीजे पर पहुंचने में कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप पहले नहीं होने चाहिए थे, 34 साल लग गए. सरकार ने पहले ही अदालत से आरोपियों के खिलाफ आरोप रद्द करने को कहा था. न्यायपालिका को उन्हें उचित मौका देने में तीन दशक लग गए. ”

जुलूस के दौरान लगाए थे नारे
पत्रकारों पर आरोप था कि साल 1987 में सहारनपुर मस्जिद के पास से गुजरने वाले एक जुलूस के दौरान इन लोगों ने भड़काऊ नारे लगाए थे. उन्हें जेल भेज दिया गया और पुलिस ने उन पर आईपीसी की धारा 147 (दंगा), 153 (दंगा भड़काना), 153 (a)(असामंजस्य को बढ़ावा देने) और 353 (लोक सेवक को रोकने के लिए हमला) के तहत मामला दर्ज किया गया था. मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भी शुरू में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 के तहत दोनों के खिलाफ आरोप लगाए थे. उन आरोपों को वापस लेने से पहले पत्रकारों को एक महीने तक सलाखों के पीछे रहना पड़ा था. इसके बाद मामला आईपीसी की संबंधित धाराओं के तहत आगे बढ़ा.

घटना के समय 30 साल के थे राकेश गर्ग

घटना के समय राकेश गर्ग 30 साल के थे. उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि वह एक रिपोर्टिंग असाइनमेंट पर थे और जुलूस में भाग नहीं ले रहे थे. उन्होंने कहा कि उन पर लगाए गए आरोपों ने उन्हें स्थायी नौकरी, बैंक ऋण से वंचित कर दिया और समाज में उनकी प्रतिष्ठा से समझौता किया है. उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडियो को बताया कि जुलूस राम रथ यात्रा था, जो सहारनपुर के गंगोह इलाके में हर साल होता है. उन्होंने कहा, "उस वर्ष और अधिक लोग देखे गए क्योंकि उस समय विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन गति पकड़ रहा था." 

मैं राजनीति का शिकार हो गया - गर्ग
गर्ग ने कहा, “मैं अकेला था जो भीड़ को शांत करने का काम कर रहा था और उनसे नारे लगाने के लिए मना कर रहा था. मैंने केवल प्रशासन से आग्रह किया कि यात्रा के आयोजकों के अनुरोध के आधार पर जुलूस को आगे बढ़ने की अनुमति दी जाए. पुलिस ने मुझ पर बिना किसी कारण मामला दर्ज कर दिया. मुझे लगता है कि मैं राजनीति का शिकार हो गया. ”

पुलिस ने दो पत्रकारों के खिलाफ मामला दर्ज करते हुए कहा कि उन्होंने अल्पसंख्यक विरोधी नारे लगाए और पीएसी कर्मियों को धक्का दिया."
 

 

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