राजस्थान में सामने आए दो बड़े खुलासों ने देश को हैरान कर दिया है. एक तरफ विदेश से एमबीबीएस कर लौटे लेकिन स्क्रीनिंग परीक्षा में फेल हुए युवाओं ने लाखों रुपये देकर खुद को डॉक्टर घोषित करवा लिया. दूसरी तरफ कजाकिस्तान से मेडिकल की पढ़ाई कर लौटे कुछ युवाओं ने स्टेथोस्कोप छोड़ साइबर ठगी का रास्ता चुन लिया. सवाल सिर्फ फर्जी डॉक्टरों का नहीं है, सवाल उस पूरी व्यवस्था का है जहां डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले कुछ लोग मरीजों की जिंदगी और आम लोगों की जमा पूंजी दोनों के लिए खतरा बन गए. लेकिन जब योग्यता की परीक्षा में सफलता नहीं मिली तो कुछ लोगों ने दूसरा रास्ता चुन लिया.
फर्जी डॉक्टरों के रैकेट का पर्दाफाश
जी हाँ, पहले राजस्थान एसओजी ने ऐसे फर्जी डॉक्टरों के रैकेट का पर्दाफाश किया है जो 20 से 30 लाख रुपये देकर मेडिकल सिस्टम में घुसपैठ कर रहे थे. कजाकिस्तान, रूस और अन्य देशों से एमबीबीएस करके लौटे कई अभ्यर्थी एफएमजीई परीक्षा पास नहीं कर सके लेकिन दलालों और भ्रष्ट नेटवर्क ने उनके लिए डॉक्टर बनने का शॉर्टकट तैयार कर दिया. फर्जी दस्तावेज, फर्जी प्रमाण पत्र और फिर मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन. अब तक 28 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं और 100 से ज्यादा लोग जांच एजेंसियों के रडार पर हैं. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. जयपुर की श्याम नगर थाना पुलिस ने अब एक ऐसे साइबर गैंग का भी पर्दाफाश किया है जिसके कई सदस्य भी कजाकिस्तान से एमबीबीएस कर चुके हैं.
साइबर अपराध की दुनिया में करियर तलाशा
गिरोह का सदस्य गणेश चौधरी और फरार सरगना सुनील बिश्नोई उर्फ कार्तिक कजाकिस्तान में मेडिकल की पढ़ाई के दौरान दोस्त बने थे. भारत लौटने के बाद दोनों ने अस्पताल नहीं, बल्कि साइबर अपराध की दुनिया में करियर तलाश लिया. इनका तरीका बेहद खतरनाक था. शातिर फर्जी डॉक्टर जो अब असली में ठग बन गए जो बड़े लोगों को फोन करते और खुद को ईडी, सीबीआई या दूसरी केंद्रीय एजेंसियों का अधिकारी बताते. फिर शुरू होता था डिजिटल अरेस्ट का खेल.
बैंक खातों की व्यवस्था कर ठगी की रकम भेजता था
डीसीपी साउथ राजर्षि राज ने बताया कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी करने वाले गिरोह का मुख्य सदस्य गणेश चौधरी है. गणेश कजाकिस्तान से एमबीबीएस की पढ़ाई करने के बाद वर्ष 2021 में जयपुर लौटा था. इसके बाद उसने सिरोही के एक सरकारी अस्पताल में इंटर्नशिप भी की. पुलिस जांच में सामने आया है कि गिरोह में उसकी अहम भूमिका थी. वहीं, साइबर ठगों को बैंक खाते उपलब्ध कराने का काम आरोपी दुष्यंत जांगिड़ करता था. दुष्यंत विभिन्न बैंक खातों की व्यवस्था कर ठगी की रकम को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने और उसे छिपाने में गिरोह की मदद करता था.
सबसे चर्चित मामला जयपुर की 75 वर्षीय महिला डॉक्टर का है. महिला को चार दिन तक वीडियो कॉल और फोन के जरिए मानसिक दबाव में रखा गया. उन्हें बताया गया कि उनके बैंक खाते आतंकवाद और देश विरोधी गतिविधियों से जुड़े हैं. डर इतना बढ़ा दिया गया कि आखिरकार महिला डॉक्टर ने करीब 24 लाख रुपये ठगों के खातों में ट्रांसफर कर दिए. जयपुर में वारदात करने के बाद इसी गिरोह ने बेंगलुरु में भी 40 लाख रुपये से ज्यादा की साइबर ठगी को अंजाम दिया.
क्रिप्टो ट्रांजैक्शन के जरिए पैसों की पूरी चेन को छिपाया जाता था
यह गिरोह विदेशों में पढ़ रहे भारतीय मेडिकल छात्रों के बैंक खातों का इस्तेमाल करता था. हैरानी की बात यह है की यह मेडिकल स्टूडेंट वो होते जो पहले से इनके जाल में फंस चुके थे जिनका इस्तेमाल यह ठग दोतरफा करने लगे. इनके खातों में सीडीएम मशीनों से नकदी जमा होती थी. फिर यूएसडीटी जैसी डिजिटल करेंसी खरीदी जाती थी. क्रिप्टो ट्रांजैक्शन के जरिए पैसों की पूरी चेन को छिपाया जाता था ताकि जांच एजेंसियां असली स्रोत तक न पहुंच सकें. फरार मास्टरमाइंड सुनील बिश्नोई फर्जी आधार कार्ड और नकली पहचान के जरिए बैंक खाते खुलवाता था और लगातार ठिकाने बदलता रहता था.
पुलिस ने कार्रवाई में 32 एटीएम कार्ड, 12 चेकबुक, 9 पासबुक, 8 सिम कार्ड, 2 रबर स्टाम्प, 5 मोबाइल फोन और लाखों रुपये नकद बरामद किए हैं. साइबर पोर्टल पर इस नेटवर्क के खिलाफ देशभर से 100 से ज्यादा शिकायतें दर्ज हैं. यानी यह कोई स्थानीय गैंग नहीं बल्कि कई राज्यों में फैला संगठित अपराध नेटवर्क है.
कजाकिस्तान से एमबीबीएस करके लौटे युवाओं पर फर्जी डॉक्टर बनकर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने का आरोप, दूसरी तरफ केंद्रीय एजेंसियों का अधिकारी बनकर लोगों की मेहनत की कमाई लूटने का खेल. दोनों मामलों में सामने आया कजाकिस्तान कनेक्शन अब जांच एजेंसियों के लिए बड़ा विषय बन गया है. राजस्थान की जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि आखिर विदेश से लौटे कुछ युवाओं के बीच अपराध का यह नेटवर्क कितना गहरा और कितना बड़ा है.
-विशाल शर्मा की रिपोर्ट
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