सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसले में कहा है कि भारत में पितृसत्तात्मक सोच आज भी समाज का हिस्सा हैं. कोर्ट ने कहा कि दशकों से कानून, सरकारी योजनाएं और सुधार लागू होने के बावजूद जमीन पर हालात पूरी तरह नहीं बदले हैं. कोर्ट ने इसे विकास और हिंसा का विरोधाभास बताया. एक तरफ देश में तरक्की हो रही है, महिलाएं पढ़-लिख रही हैं और काम कर रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ घरेलू हिंसा और दहेज जैसी समस्याएं खत्म नहीं हो रही हैं.
किस मामले में आई यह टिप्पणी?
यह टिप्पणी एक ऐसे केस में आई, जिसमें एक व्यक्ति ने शादी के सिर्फ एक महीने बाद अपनी पत्नी को जिंदा जला दिया था. आरोपी ने पहले पत्नी को पीटा, फिर उस पर केरोसिन डालकर आग लगा दी और कमरे को बंद कर फरार हो गया. पीड़िता को पड़ोसियों ने बचाकर अस्पताल पहुंचाया, जहां उसने मरने से पहले बयान दिया. कोर्ट ने इस मामले में आरोपी की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा और उसकी अपील खारिज कर दी.
समाज में अब भी पितृसत्ता हावी
जस्टिस संजय करोल और एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि भारत में आर्थिक विकास, शिक्षा और महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों में आज भी पुरुषों का वर्चस्व बना हुआ है. आज भी महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे नौकरी करने के बावजूद घर के सारे काम संभालें. उनकी स्वतंत्रता अक्सर सीमित रहती है और फैसले लेने का अधिकार पुरुषों के पास ही ज्यादा होता है.
कानून और योजनाएं सिर्फ कागजों तक?
कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान महिलाओं को बराबरी और स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन कई मामलों में ये अधिकार अभी भी पूरी तरह जमीन पर नहीं दिखते. सरकार की कई योजनाएं महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए चलाई जा रही हैं, लेकिन समाज की सोच बदलना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है.
आंकड़े भी दिखाते हैं गंभीर तस्वीर
कोर्ट ने National Crime Records Bureau के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2023 में महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख से ज्यादा अपराध दर्ज हुए. हर साल 6,000 से ज्यादा महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में होती है. वहीं, National Commission for Women के पास आने वाली शिकायतों में घरेलू हिंसा सबसे आम समस्या बनी हुई है.
आखिर जिम्मेदारी किसकी?
कोर्ट ने आखिर में कहा कि इस समस्या का जवाब हम भारत के लोग के पास ही है. जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक महिलाओं के खिलाफ हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं हो पाएगी. यह फैसला सिर्फ एक केस का नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है कि अब बदलाव सिर्फ कागजों पर नहीं, जमीन पर भी दिखना चाहिए.
क्या था पूरा मामला?
राजस्थान के इस मामले में अपीलकर्ता शंकर की शादी सुगना बाई से उनकी मौत से करीब एक महीने पहले हुई थी, लेकिन शादी के 20 दिन के भीतर ही उसके अत्यधिक शराब सेवन और हिंसक व्यवहार के कारण रिश्ते बिगड़ने लगे थे. 15 अक्टूबर 2012 को जब सुगना बाई अपने मायके गई थीं, तब शंकर उन्हें जबरदस्ती वापस घर ले आया और खाना बनाने को कहा. इसी दौरान नशे में उसने उनके साथ मारपीट की, गला दबाया और कमरे को अंदर से बंद कर दिया, फिर उन पर केरोसिन डालकर आग लगा दी. हालांकि बाद में पड़ोसियों ने आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन वह गंभीर रूप से झुलस चुकी थीं. इलाज के दौरान 19 अक्टूबर 2012 को सेप्टीसीमिया के कारण सुगना की मौत हो गई.
मौत से पहले सुगना ने अपने पति के खिलाफ बयान दिया था. इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने 10 दिसंबर 2014 को शंकर को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. राजस्थान हाईकोर्ट ने 2019 में उसकी अपील खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
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