जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर सुर्खियों में हैं. इस बार उन्होंने अपना दर्द बयां किया है. ज्ञानवापी मामले में फैसला सुना कर चर्चाओं में आए जज रवि कुमार दिवाकर इस समय मुजफ्फरनगर जनपद की फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट संख्या 3 में तैनात है. जज दिवाकर ने नवंबर 2025 में मुजफ्फरनगर में पदभार संभाला था. अपने कुछ ही महीना के कार्यकाल में जज रवि कुमार दिवाकर ने मुजफ्फरनगर जनपद में 11 मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा सुना कर एक बार फिर से सुर्खियां बटोरी थी.
जज ने बयां किया अपना दर्द-
जानकारी के मुताबिक कुछ महीनो में 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनने के बाद तत्कालीन जिला जज बीरेंद्र कुमार सिंह ने 18 अगस्त को हत्या की 97 पत्रावली रिकॉल कर ली थी. जिसके बाद जिला जज तो सेवानिवृत हो गए हैं. लेकिन पत्रावली रिकॉल पर जज दिवाकर ने गुरुवार को एक एनडीपीएस एक्ट के 10 साल पुराने मामले में फैसला सुनाते हुए अपना दर्द बयां किया है.
न्यायाधीश के अन्याय हो तो कहां जाए- जज
जिसमें उन्होंने कहा है कि न्यायाधीश का काम न्याय करना होता है और अगर उसी के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए. क्या एक जज जो जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में अपने दायित्व का निर्वाह करता है, वह जज जिला जज के ऐसे आदेश जो विधि के विपरीत है को करने के लिए बाध्य है या नहीं.
फिल्म 'दामिनी' का किया जिक्र-
आपको बता दें कि 10 साल पुराने एनडीपीएस एक्ट के इस मामले में जज रवि कुमार दिवाकर ने कल साक्ष्य के अभाव में अभियुक्त अशोक भारती को दंड मुक्त कर दामिनी फिल्म का जिक्र करते हुए कहा है कि दामिनी फिल्म का यह डायलॉग काफी प्रसिद्ध है कि न्यायालय से तारीख पर तारीख मिलती है परंतु न्याय नहीं.
जज रवि कुमार ने क्या कहा?
अपने इस फैसले में जज रवि कुमार दिवाकर ने कहा है कि जनपद न्यायाधीश ने बिना कारण बताए एक तरह से 9 आदेश पारित कर पत्रावलिया रिकॉल की है, जबकि दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 409 में प्रावधान है कि जिला जज किसी मामले को रिकॉल कर सकते हैं. लेकिन धारा 409 (2) के मुताबिक यदि किसी मामले में ट्रायल शुरू हो चुका है अर्थात पार्ट हेड केस है तो सेशन जज रिकॉल नहीं कर सकते. इसलिए उनकी कोर्ट से पत्रावलियों को बिना कारण बताएं वापस मंगवाना विधि विपरीत था. आदेश में सिर्फ रिकॉल शब्द का प्रयोग किया गया था और कोई भी कारण अभिलिखित नहीं किया गया था. जिसके चलते यह स्पीकिंग ऑर्डर नहीं था.
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