नागपुर शहर की अपनी कई ऐसी अनोखी परंपराएं हैं, जो इसे देश के दूसरे हिस्सों से अलग पहचान देती हैं. इन्हीं परंपराओं में शामिल है मारबत उत्सव. बैल पोला के दूसरे दिन नागपुर में काली और पीली मारबत की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है. करीब 145 साल पुरानी यह परंपरा आज भी हजारों लोगों को अपने साथ जोड़ती है.
नागपुर में मारबत जुलूस निकालने की परंपरा अंग्रेजी शासन के दौर से जुड़ी हुई है. इतिहास के अनुसार, काली मारबत की परंपरा 1881 के आसपास शुरू हुई थी. उस समय अंग्रेजों के अत्याचार और तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं के खिलाफ लोगों के आक्रोश को मारबत के जरिए सामने रखा गया. एक मान्यता के मुताबिक, नागपुर के भोसले राजघराने की बाकाबाई द्वारा अंग्रेजों का साथ दिए जाने के विरोध में काली मारबत निकालने की परंपरा शुरू हुई थी. इसके बाद लोगों ने इस आयोजन को अपनी भावनाओं और विरोध को व्यक्त करने का माध्यम बना लिया.
पीली मारबत की भी है खास पहचान
काली मारबत के कुछ वर्षों बाद पीली मारबत की परंपरा सामने आई. 1880 के दशक में नागपुर के जागनाथ बुधवारी क्षेत्र के तराने तेली समाज से जुड़ी इस परंपरा ने भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों की भावनाओं को आवाज दी. समय के साथ मारबत उत्सव का अर्थ और भी व्यापक हो गया. अब इसे समाज की बुराइयों, रोगराई, अंधविश्वास और नकारात्मक शक्तियों को दूर करने के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है.
'ईडा पीडा, रोगराई घेऊन जा गे मारबत'
मारबत की शोभायात्रा के दौरान 'ईडा पीडा, रोगराई घेऊन जा गे मारबत' का जयघोष सुनाई देता है. मान्यता है कि काली मारबत बुरी शक्तियों और नकारात्मकता का प्रतीक है, जबकि पीली मारबत को बुराइयों और संकट को दूर करने वाली शक्ति के रूप में देखा जाता है.
कई हफ्तों पहले शुरू हो जाती है तैयारी
मारबत उत्सव के लिए तैयारियां कई सप्ताह और कई बार महीनों पहले शुरू हो जाती हैं. मारबत और बडगों को तैयार करने का काम विशेष तरीके से किया जाता है. उत्सव के दिन शहर की सड़कों पर बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं और जुलूस में शामिल होते हैं.
करीब 145 साल बाद भी यह परंपरा नागपुर की लोक-संस्कृति का अहम हिस्सा बनी हुई है. समय के साथ मुद्दे जरूर बदले हैं, लेकिन मारबत का संदेश आज भी वही है. समाज से बुराई और नकारात्मकता दूर हो और सुख-शांति का आगमन हो.
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