माता-पिता की मौत पर मिलनी चाहिए 13 दिन की पेड लीव, BJP सांसद दिनेश शर्मा ने राज्यसभा में उठाया मुद्दा

राज्यसभा में बीजेपी सांसद दिनेश शर्मा ने सरकारी और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के माता-पिता की मौत के बाद 13 दिन का पेड लीव का मुद्दा उठाया. उन्होंने इसके लिए 3 आधार बताए. इस दौरान दिनेश शर्मा ने मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी के साथ वेदों का भी जिक्र किया.

Dinesh Sharma (Sansad Tv/Screengrab)
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 13 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:17 PM IST

उत्तर प्रदेश के पूर्व डिप्टी सीएम और राज्यसभा में बीजेपी सांसद दिनेश शर्मा ने सदन में एक अहम मुद्दा उठाया. दिनेश शर्मा ने माता-पिता की डेथ होने पर कर्मचारियों को 13 दिन की पेड लीव देने की मांग उठाई. दिनेश शर्मा ने कहा कि पैरेंट्स को खो देने के बाद कर्मचारी के पास कोई ऑप्शन नहीं बचता. उसके सामने बड़ा सवाल होता है कि धर्म का पालन करे कि नौकरी बचाए. उन्होंने कहा कि इस हालत में कर्मचारी ठीक से काम भी नहीं कर पाता है.

धर्म का पालन करे या नौकरी बचाए?
दिनेश शर्मा ने कहा कि आज मैं सनातन परंपरा के रक्षा के संबंध में एक समस्या को उजागर करना चाहता हूं, जो भारत के लाखों सनातनी कर्मचारियों के जीवन में एक संकट बनकर उभरी है. जब कोई अपने माता-पिता को खो देता है तो उसे एक असंभव विकल्प का सामना करना पड़ता है. अपने धर्म का पालन करे या अपनी नौकरी बचाए. इसका मुख्य कारण ये है कि भारत के वर्तमान श्रम कानूनों में सवैतनिक शोक अवकाश के लिए कोई प्रावधान या दिशा-निर्देश नहीं है.

कनाडा-जर्मनी जैसे देशों में कानून-
दिनेश शर्मा ने कहा कि कई देशों में शोक अवकाश का सुविधा है. उन्होंने कनाडा और जर्मनी का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि कनाडा और जर्मनी जैसे देशों में इस तरह का प्रावधान है.

दिनेश शर्मा ने वेदों का किया जिक्र-
दिनेश शर्मा ने कहा कि मैं सदन के सामने 3 प्रमुख आधार रखना चाहता हूं. उन्होंने कहा कि हमारे शास्त्रों में माता-पिता की सेवा और उनके मृत्यु के बाद के कर्तव्यों को पितृ ऋण से मुक्ति का एक मात्र मार्ग बताया गया है. भारतवर्ष परंपरा के साथ धर्मनिष्ठपूर्ण समाज के तौर पर जाना जाता है. दिनेश शर्मा ऋग्वेद में अग्नि का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि गरुण पुराण के अनुसार मृत्यु के 13 दिन बाद तेरहवीं और शुद्ध हवन के बाद ही परिवार समाज में लौटने के योग्य होता है. अर्थवेद के 18वें कांड में मृत्यु के बाद के अनुष्ठानों के बाद का विस्तृत विवरण दिया है. जिससे स्प्ष्ट है कि माता-पिता का अंतिम संस्कार करना अनिवार्य है. ये केवल परिवार की भावना का विषय नहीं है, ये धर्म है, हमारे शास्त्रों द्वारा निर्धारित कर्तव्य है.

हम इंसान तैयार कर रहे हैं या मशीनें?
दिनेश शर्मा ने दूसरा आधार बताया. उन्होंने कहा कि हार्वर्ड की रिपोर्ट कहती है कि शोक में डूबा कर्मचारी 50 फीसदी तक कम उत्पादक होता है. इस प्रतिस्पर्धा में विशेषकर सरकारी नौकरी, एमएनसी, निजी क्षेत्र में एक डरावना ट्रेंड उभरकर आ रहा है. उन्होंने कहा कि काम के भारी बोझ और आलवेज ऑन डिजिटल संस्कृति के कारण बच्चे अपने माता-पिता के अंतिम संस्कारों को 2 या 3 दिन में समेटने को मजबूर हैं. ये ना सिर्फ धार्मिक तरह से विनाशकारी है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक है. जब वो अधूरी रस्म के साथ लौटता है तो शरीर वहां होता है, मन में ग्लानि से दबा होता है. हम इंसान तैयार कर रहे हैं या मशीनें.

अंतिम संस्कार मौलिक अधिकार है- दिनेश शर्मा
तीसरा आधार बताते हुए दिनेश शर्मा ने कहा कि संवैधानिक अधिकार हमारा है कि अभी हाल में मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि माता-पिता का अंतिम संस्कार संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत एक मौलिक अधिकार है. इसके तहत उन्होंने छुट्टी का प्रावधान किया है. वेतन समिति ने भी शोक अवकाश की सिफारिश की है.

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